साहित्य

दौड़ती जिंदगी में ठहराव,,,

सौ, भावना मोहन विधानी

दौड़ती जिंदगी में ठहराव जरूरी है,
भागना ही हरपल क्यों मजबूरी है?
कभी सोचा हम क्या खोते जा रहे हैं?
जिंदा है लेकिन मरते ही जा रहे हैं।

नाम पद प्रतिष्ठा से क्या मिल जाएगा?
सफर का मजा है वह कहां से आएगा?
सबको साथ लेकर चलो कोई बात हो,
अजनबियों सी न अपनों से मुलाकात हो

सांसों की पटरी पर जिंदगी दौड़ती है,
जीवन के अनकहे भेद खोलती है।
जरा रुक कर थोड़ी सांस तो ले लो,
आगे बढ़कर खुशियों को गले लगा लो।

सब यहीं रह जाएगा फिर क्यों भागना?
गहरी नींद से अब सबको पड़ेगा जागना।
जिंदगी में कुछ ठहराव बहुत जरूरी है,
चंद लम्हों में ही खुश रहना जरूरी है।

सौ, भावना मोहन विधानी
अमरावती महाराष्ट्र

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