
एकदिन मैं एक रेस्टोरेंट के सामने खड़ा था। तीन युवती रेस्टोरेंट से मंहगा खाना खाकर निकली। उसी वक्त एक बुजुर्ग मुस्लिम महिला ने कुछ मदद के लिये हाथ फैलाया। बहुत विनम्र निवेदन के साथ मांग रही थी कि कुछ सहायता राशि मिल जाये।
वह एक इस उम्मीद से लपककर आगे जल्दी से आकर मांग की कि कुछ इन मुस्लिम युवती से मदद मिल जायेगा। एक जैसे हेय दृष्टि से देखकर बिना कुछ मदद किये स्कूटी लेकर तीनों आगे बढ गयी।
एक उम्मीद, एक भरोसा पलभर में बिखर गया। जिस उम्मीद से लपककर आगे बढी थी वह भरभराकर खंडहर में तब्दील हो गया। चेहरे पर जैसे किसी ने एक थप्पड़ मारा हो।
हजारो का खाना गटक कर जाने वाली इन तीनों युवतियों का ह्रदय नहीं पसीजा कि दस रूपये निकालकर उस बुजुर्ग माता के कटोरे में डाल सके।
थकी हारी मिली असफलता से अर्थात युवतियों से नकारात्मक संदेश से मुझसे नहीं मांग की। जिससे उम्मीद थी वह ठेंगा दिखा दी। शायद यही सोंच कर बिना देखे आगे तेजी से बढी। यह सोंचकर यह भी जले पर नमक न छिड़क दे।
मैं बुजुर्ग महिला के टूटती भावना को सम्भाला और तुरंत बुढी अम्मा को आगे बढने से रोका और यथासंभव मदद की। मेरी मदद से उनके चेहरे पर जैसे बिछड़ा बेटा मां को मिल जाने पर जो खुशी मां को होती है वही खुशी मैंने देखा।
उस अम्मा ने मुझे मेरे इस छोटी मदद से उनका ह्रदय गदगद हो गया। उनके मुंह से जो शब्द निकल रहा था, मुझे स्तब्ध कर दिया। बेटा तूने मुझे बुलाकर जैसे मदद की… अल्लाह तुमको खूब उंचाइयों पर ले जायेगा। खूब तुम तरक्की करोगे। मैं दिल से तुम्हे आशीर्वाद दे रही हूं। मेरा यह आशीर्वाद जरूर तूम्हे लगेगा।
उस मां ने बताया कि उसका पति लकवाग्रस्त है। किसी मजार पर रहती हैं। किसी तरह मांगकर गुजारा चल रहा है। लोगों द्वारा मदद मिलती है। कई तो डांट कर भगा देते हैं।
इसी तरह समाज में किसी न किसी परिस्थितियों के कारण भीख मांगने पर कुछ लोग विवश है। जो व्यक्ति सक्षम हैं उनको आगे आकर मदद करनी चाहिये। ऐसे असहाय जीवन जीने वाले, जो बेहद खराब जीवन से गुजर रहे हैं।
जयचन्द प्रजापति ‘जय’
प्रयागराज




