जब मेरा प्लास्टिक का जूता फट जाता,
उसे खुद सिल कर,स्कूल भेजती थी “माँ”।
फूंकनी से चूल्हे में फूंक मार मार कर,आंखों में धुआं झेल, मेरे लिए रोटी बनाती थी “माँ”।
मेरी पीछे से फ़टी पतलून देख, मेरी शर्म को ढकने को, टाकी लगाती थी “माँ”।
मेरी शरारतों से जब तंग आ जाती थी,
आने दे तेरे पापा को,कह गुस्सा दिखती थी माँ।
जब कभी पड़ोस में,टी.वी देखने को न मिलता
घर पर रेडियो पर हवा महल चलाती थी “माँ”।
पढ़ते लिखते हम कैसे है, ये तो उसे पता न था,
पर दूध में , बोर्नविटा पिलाती थी “माँ”।।
जब कॉलेज की फीस का दिन आता था,
रुमाल में बन्धे रुपये निकाल लाती थी “माँ”।
अखबार के लिफाफे बनाना,लोगों के कपड़े सिलना, घर चलाने में सहयोग करती थी “माँ”,
आज में दुनिया का सबसे धनी व्यक्ति हूँ,
क्योकि मेरे पास है, “माँ”।।
अतुल कुमार
गडखल
जिला सोलन ।।




