
मेरे बारे में जानकर क्या करोगे,
जब खुद से मिलने का हौसला नहीं।
सवाल मुझसे पूछते हो बार-बार,
मगर अपने आईने से नज़र मिलती नहीं।
अपने अनकहे सवालों के जवाब ढूँढना सही है,
मगर चेहरे बदलकर सच छुपाना सही नहीं।
यहाँ हर शख़्स मुस्कान बिखेरे चलता है,
और कहता है—उसे किसी से शिकवा नहीं।
इस दुनिया में रंग देखने को बहुत कुछ हैं,
फिर भी अक्सर नज़रें धोखा खा जाती हैं।
सच सामने हो तो झूठ झुक जाता है,
फिर भी झूठ की राहें आसान नज़र आती हैं।
कहते हैं झूठ बोलना बुरा नहीं,
क्योंकि सच सुनने का सलीका नहीं।
सब चाहते हैं पल-दो-पल की खुशी,
मगर दुख ढूँढ ही लेता है
अपनी घड़ी, कहीं न कहीं।
जगदीश कुमार धुर्वे
सुखतवा, नर्मदापुरम (म.प्र.)




