
किसी के धोखे ने अगर तेरी रूह को आज़माया है,
सब कुछ लुटा कर अगर तूने मौत को करीब पायी है।
जीने की इच्छा अगर तिनके की तरह बिखर गई,
याद रख, तेरी कहानी अभी मुकम्मल नहीं हुई।
तेरे घर का कोई शख्स अगर तुझे चैन से जीने न दे,
तेरी खुशियों की राह में अगर वो काँटे बिछा दे।
तू जानता है वो न सुधरेगा, न तुझे आगे बढ़ने देगा,
पर क्या तू अपनी बर्बादी का इल्ज़ाम वक्त पर मढ़ेगी?
न मिली खानदानी दौलत, न मिला अपनों का सहारा,
मंजिल के करीब पहुँच कर भी, तू खुद को हारा।
एक दिन ये मलाल तुझे भीतर से पूरी तरह खाएगा,
जब तू खुद से पूछेगी— “मैं अपने लिए क्यों न जी पायी?”
क्यों दूसरों की उम्मीदों में तूने अपनी उम्र गँवा दी?
क्यों अपनों की खातिर तूने अपनी हस्ती मिटा दी?
सच्ची मानो, ये दुनिया तुझे बड़ा धोखा देने वाली है,
तेरी झोली खुशियों से नहीं, बस गमों से भरने वाली है।
अब वक्त है संभलने का, खुद का सच्चा यार बन जा,
गैरों के बनाए रास्तों से हटकर, अपनी खुद की दीवार बन जा।
कह दे ज़माने से— “भाड़ में जाओ सारे, अब मैं अपने लिए जीऊँगी,”
ज्योती वर्णवाल
नवादा (बिहार)



