साहित्य
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कोहरे की चादर
‘कोहरे की चादर ‘ कोहरे की चादर ओढ़े शरद-सुहानी प्रात निराली, ऊषा-रानी अरुणिम आभा सप्त रंगों में छलकाती है। सखी-सहेली…
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एक उम्मीद की किरण.. संस्मरण
एकदिन मैं एक रेस्टोरेंट के सामने खड़ा था। तीन युवती रेस्टोरेंट से मंहगा खाना खाकर निकली। उसी वक्त एक बुजुर्ग…
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हिंद के हिंदू सनातनी
हम हिंद के हिंदू सनातनी , हम नहीं चाहते तनातनी , किंतु कोई ऑंख दिखाए , हथियार ले करें घनाघनी…
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पहचान होती अपने आप ही
आजकल बोलती है कलम और बोलती है दवात भी। अपनों की पहचान होती है, अपने आप ही। होते है गुण…
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विभावरी -जाग री
बीत रही है यह, विभावरी जाग री —धीरे धीरे भोर का धुंधलका दे रहा है दस्तक… तिमिर और तारे भी…
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ग़ज़ल
इस जमाने में हमारे ग़म दिलबर में नहीं चलता जाने न वो अपने बस दिनकर में नहीं।।//१// जीते हैं सब…
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वो जिन्दगी में न कुछ
वो जिन्दगी में न कुछ ताज़गी भी होती है जो आशिकी से ही सब दुश्मनी भी होती है।।//१// बहे है…
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इस बेबसी में रूठ के
इस बेबसी में रूठ के जाने से क्या मिला अब सुलगते हैं ज़ख़्म जलाने से क्या मिला।।//१// रुसवा न कर…
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भानु नित्य भोर में
भानु नित्य भोर में रश्मियाँ प्रसारता। भृंग बाग में सदा धुन मधुर सँवारता॥ पेड़ नित्य झूमते बाँह नित पसारते। पुष्प…
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मुझे देने बैठ गया ज्ञान
मेरा एक दोस्त नादान मुझे देने बैठ गया ज्ञान आदमी के संस्कारों का आजकल बुरा हाल है इसकी नजर में…
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