
उड़ी उड़ी रे पतंग उड़ी उड़ी रे,
लेके रंगों की बयार उड़ी उड़ी रे।
लाल,हरी,नीली,पीली और बसंती,
रंग-बिरंगी लम्बी-छोटी पूँछों वाली,
आबाल-वृद्ध सबको तो है बहलाती,
दौड़-दौड़कर लूटने वालों संग उड़ी रे।
उड़ी उड़ी रे पतंग ———–
घर-घर ख़ूब बने पकवान,
सोंधी-सोंधी ख़ुशबू आए,
मृदुल-मृदुल बातों के संग,
मीठा-मीठा स्वाद लुभाए,
उड़ी उड़ी रे पतंग ——-
दही-बड़े की बात न पूँछो,
पापड़, चटनी और अचार,
खिचड़ी ऊपर घी जो तैरे,
तन-मन आनन्दित हो जाए।
उड़ी उड़ी रे पतंग ——–
विविध नामों से जाना जाए,
पूरब से दक्षिण तक अपनी
सारे भारत में धाक जमाए,
नये कैलेंडर में त्योहारों का आगाज़ कराए।
उड़ी उड़ी रे पतंग उड़ी उड़ी रे
लेके रंगों की बयार उड़ी उड़ी रे।।
सुषमा श्रीवास्तव
रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड।
16-01-26




