
एक भावुक कविता
जिसको पढ़कर आप अपनी आंखों से आँसू नहीं रोक पाएंगे
#कल तक जिनकी हँसी से घर का हर कोना खिलता था
माँ की गोदी में सोकर जो चाँद सितारों सा मिलता था।
आज वही नन्हे चेहरे बस तस्वीरों में रह गए
कुछ पल की लापरवाही में कितने सपने ढह गए।
किसी ने रोटी सेंकी थी कोई खिलौना लाने था
किसी पिता को शाम ढले अपने बच्चे को गले लगाने था।
पर किस्मत ने ऐसा पन्ना आँसू से लिख डाला है
चौदह नन्हे फूलों को आग ने निगल डाला है।
माँ चौखट पर बैठी-बैठी अब भी राह निहार रही
आ जाओ बेटा कह-कहकर अपनी साँसें हार रही।
बाप के काँधे झुक गए हैं, आँखें पत्थर बन बैठीं
दुनिया भर की दौलत भी अब उनकी पीड़ा हर न सकीं।
थोड़े से लालच ने देखो कितना बड़ा कहर ढाया
कुछ चाँदी के टुकड़ों खातिर इंसानों ने ज़मीर गंवाया।
जिन हाथों को रक्षा करनी थी वे भी मौन खड़े निकले
नियमों के रखवाले जाने कैसे इतने बड़े निकले।
रोता है अब लखनऊ सारा, रोती हर इंसानियत है,
उन मासूमों की चिताओं पर शर्मिंदा आज सियासत है।
हे ईश्वर! उन नन्हे तारों को अपनी गोद बसा लेना
और इस धरती के लोगों को थोड़ा इंसान बना देना।
जब बच्चों की अर्थियाँ उठती हैं, तब केवल घर नहीं रोते, पूरी मानवता रोती है।
कुलदीप सिंह रुहेला
सहारनपुर उत्तर प्रदेश




