साहित्य

कुछ मेरी भी सुनो

वीणा गुप्त

हे ईश ! कृपानिधान दाता,

विनती मेरी सुन लीजिए,

भगवानगीरी कर चुके बहुत

अब आदमीगीरी कीजिए।

 

आपकी जीवन यात्रा तो प्रभु जी !

सतयुग से द्वापर तक

मेट्रो सी स्मूथ चली।

मुझ गरीब को मिले

हर मोड़ पर जाम,

सड़कें मिलीं गड्ढों भरीं।

 

रेड लाइट पर खड़े-खड़े ही,

लीटरों पेट्रोल फुँक गया,

सच कहता हूँ भगवान जी,

इस आदमीगीरी में मैंने,

ज़िंदगी को बहुत-बहुत

मिस किया।

 

विस्तार से सुनाऊँ दुखड़े अपने,

तो आँसू तुम्हारे भी

निकल आएँगे।

भगवान होने के फायदे

आपको,

इस कंपेरिजन के बाद

समझ आएँगे।

 

अब नहीं रहा वो जमाना,

जब ‘जागो मोहन प्यारे’ गाकर,

मम्मा यशोदा

आपको जगाती थीं।

माखन- मिश्री खिला,

बलैया ले-लेकर,

दाऊ,ग्वाल,गैयों सहित

आपको,

पिकनिक पर पठाती थीं।

यहाँ तो ठुमुक-ठुमुक

चलने की उम्र में ही,

बैग कंधों पर धरना पड़ा।

नींद भरी आँखें लिए ही,

स्कूल की ओर चलना पड़ा।

 

बैग कितना भारी होता है,

आप क्या जानें?

आपने तो केवल सात दिन

गोवर्धन पर्वत उठा कर,

इतिहास रच लिया था।

 

मैं तो पिछले पंद्रह सालों से,

रोजाना बैग उठा रहा हूँ,

और गधे की पदवी पा रहा हूँ,

अभी पांँच-सात साल

और उठाऊंँगा,

तब कहीं जाकर,

जॉब के काबिल हो पाऊंँगा।

 

ओ लकी चैप!

आप तो तेरह वर्ष की आयु में ही,

अंकल कंस का राज्य पा गए थे।

कुछ मेरी भी सोचो दयानिधे,

राज्य न सही,

यू.एस.ए  का वीज़ा ही

दिलवा दीजिए,

डॉलर कमाऊँगा,

एन .आर .आई .बन जाऊँगा

हर जन्माष्टमी पर मंदिर में,

और पंद्रह अगस्त पर,

राष्ट्रीय सुरक्षा कोष में

पैसे भिजवाऊँगा।

 

कुछ कहा आपने?

यू .एस. ए  .ज्यादा है।

कोई बात नहीं कृपानिधान,

किसी रियल्टी शो में ही जितवाइए,

पेज थ्री पर प्रकटाइए।

सैलीब्रेटी बनवाइए।

बॉलीवुड में एन्ट्री दिलवाइए।

 

 

आप का ब्रजप्रेम तो

जग जाहिर है।

मुझे भी देश प्रेमी बनवाइए

गुरु! किसी तगड़ी पार्टी का

टिकट दिलवाइए।

इलैक्शन मैं जीत लूंँगा,

आपको टेंशन न दूंँगा,

चेला हूँ तुम्हारा।

कैसे मरेगा दुर्योधन ,

जानता हूँ  भेद सारा।

 

ओ गॉड !

आप तो हर मामले में

बड़े किस्मत वाले थे।

बचपन में आपने शैतानियों के ,

सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले थे,

फिर भी सबकी आँखों के तारे थे।

धोनी बनने के चक्कर में,

हमसे तो एक बार पड़ोसी की,

कार का शीशा क्या टूट गया ,

धुनाई हुई ऐसी कि बल्ला ,

सदा सर्वदा के लिए छूट गया।

 

आप सी किस्मत मेरी कहाँ ?

दोस्त हों या गर्लफ्रैंड ,

पॉलिटिक्स हो

या कुरूक्षेत्र का फ्रंट।

हर जगह आपकी ही,

बल्ले-बल्ले थी।

बंसी की धुन पर

नाचता था वृंदावन सारा

हमें तो सब साईड दे ,

कहकर निकल जाते हैं

 

कुछ मेरी भी सोचो,

ब्रजवुड के रसिया!

मेट्रिमोनियल में छपते-छपते,

बुढ़ाने लगा हूँ ।

मिलन हुए बिना ही,

विरह गीत गाने लगा हूँ।

 

डियर बॉस!

आपके युग में तो ,

दूध की नदियाँ बहतीं थीं।

वंशीवट थे,हरेभरे झुरमुट थे,

हवा भी पॉल्यूशन फ्री रहती थी।

मुझे कहाँ ला पटका

कुंजबिहारी !

इस कांकरीट के जंगल में,

जहाँ प्रकृति भी

बॉय-बॉय  कह,

हाथ हिला रही है।

ग्लोबल वार्मिंग पूतना सी

मँडरा रही है।

मंँहगाई दिनों दिन ,

कंगारू सी छलाँग

लगा रही है।

 

बताइए तो श्रीमान् ,

ऐसे कब तक चलेगा,

बेचारा आम आदमी,

कहाँ जाएगा,क्या करेगा?

 

हे सर्वशक्तिमान्!

मेरी बातों को

अन्यथा न लीजिए।

बुरा लगा गर आपको,

पकड़ता हूँ कान,

प्लीज,माफ़ कीजिए।

 

दयानिधे! आपकी तो

सीमाएँ हैं अनंत।

संभावनाएँ हैं अपार,

मैं हूँ अदना सा आदमी,

दायरों में कैद,

आदतों से  लाचार ,

बालक हूँ आपका  ,

धीर मुझे दीजिए।

 

हे ईश! दयानिधान ,

विनती मेरी सुन लीजिए।

भगवानगीरी हुई बहुत

अब आदमी गीरी कीजिए।

 

वीणा गुप्त

नई दिल्ली।

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