साहित्य

कबीरदास जी

डा. राजेश तिवारी

अक्कड़ फक्कड़ भगत थे , ऐ कबीर महराज ।

पढ़े लिखे तो थे नहीं , सुधियों के सरताज ।।१

साखी सुन्दर सृजन की , शब्द सुनाते शोर ।

रमे रमैनी राम जी , जागत हो गइ भोर ।।2

जो कुरीति उस समय की , कीन्हा गजब प्रहार ।

बड़े बड़े जोगी जती , गय थे उनसे हार ।।3

चलती चक्की देखकर , बोलन लगा कमाल ।

माया से बचना जरा, ये जग है जंजाल ।।४

कर्मयोग की कहत थे , श्री कबीर महराज ।

पर पाखंडी का किया , जो विरोध है नाज ।।५

नमन करत सब आपको , सखी भाव में मस्त ।

बहुत विरोधी आपके , आकर हो गय पस्त ।।६

ढाई आखर जानते , प्रेम कि थे जागीर ।

दुखिया सब संसार है , सालत थी ये पीर ।।७

करते कवि गुणगान हैं , ताना बाना याद ।

हो सदभाव समाज में , भारत रह आबाद।।८

कइ कवि कबीर छाप से , कविता करते मित्र ।

है सुगन्ध वैसी कहां , जो कबीर का इत्र ।।९

पंचमेल बोली भली , कलि सी खिली गुलाब ।

फूल बटोरे सबन ने , उनका नहीं जबाब ।।१०

 

डा. राजेश तिवारी ‘मक्खन’

झांसी उ प्र

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