
अक्कड़ फक्कड़ भगत थे , ऐ कबीर महराज ।
पढ़े लिखे तो थे नहीं , सुधियों के सरताज ।।१
साखी सुन्दर सृजन की , शब्द सुनाते शोर ।
रमे रमैनी राम जी , जागत हो गइ भोर ।।2
जो कुरीति उस समय की , कीन्हा गजब प्रहार ।
बड़े बड़े जोगी जती , गय थे उनसे हार ।।3
चलती चक्की देखकर , बोलन लगा कमाल ।
माया से बचना जरा, ये जग है जंजाल ।।४
कर्मयोग की कहत थे , श्री कबीर महराज ।
पर पाखंडी का किया , जो विरोध है नाज ।।५
नमन करत सब आपको , सखी भाव में मस्त ।
बहुत विरोधी आपके , आकर हो गय पस्त ।।६
ढाई आखर जानते , प्रेम कि थे जागीर ।
दुखिया सब संसार है , सालत थी ये पीर ।।७
करते कवि गुणगान हैं , ताना बाना याद ।
हो सदभाव समाज में , भारत रह आबाद।।८
कइ कवि कबीर छाप से , कविता करते मित्र ।
है सुगन्ध वैसी कहां , जो कबीर का इत्र ।।९
पंचमेल बोली भली , कलि सी खिली गुलाब ।
फूल बटोरे सबन ने , उनका नहीं जबाब ।।१०
डा. राजेश तिवारी ‘मक्खन’
झांसी उ प्र
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