
मैं बीती बातें कब कहता हूँ,
मैं बीती रातें कब कहता हूँ।
मैं गाता नहीं शोक और क्रंदन की गाथा,
केवल मधुर गीत ही गाता हूँ।
मैं दोहराता नहीं अनकही बातें,
मैं गाता नहीं अनसुनी बातें।
मैं गाता नहीं भेड़ियों की चालें,
मैं तो केवल सुर-संगीत सजाता हूँ।
मैं केवल सपनों को सजाता हूँ,
मैं गीता और भारत को गाता हूँ।
मैं गाता हूँ ममतामयी माँ की गाथा,
केवल उसके आँचल में रहता हूँ।
मैं आशा के दीप जलाता हूँ,
मैं प्रेम का संदेश सुनाता हूँ।
द्वेष, छल और कपट की राहों से दूर,
मानवता का पथ अपनाता हूँ।
मैं बीती बातें कब कहता हूँ,
मैं नव प्रभात की वंदना करता हूँ।
जीवन के हर अंधकार में भी,
उम्मीद का गीत सुनाता हूँ।
— ऋतु गर्ग,सिलीगुड़ी पश्चिम बंगाल
स्वरचित मौलिक रचना




