
तजुर्बा
दिल में काश एक आईना होता
कभी तुम्हारी सूरत होती उसमें,
तो कभी मैं होता!!
अफ़सोस बहुत था तुझसे हारने का
काश हमारे साथ कोई अपना होता!!
टूट कर बिखर जाने के लिए हूँ क्या
गुलों को भी खिलने का बहाना होता!!
ज़मीन भी साथ ले गया वह तो मेरी
बड़ी मुश्किल होती अगर,
आसमांँ नहीं होता!!
दुश्मन तो जान लेकर मानता
ग़र हममें थोड़ा हौसला ना होता!!
चांँद बादल में छुप गया है शायद
वर्ना रात में इतना अंधेरा ना होता!!
वादा तोड़े और तोड़ता चला जाए
दुश्मन मेरा इतना ना बेवफ़ा होता!!
उसूलों पर चले तो यह आलम है
क़दम बहक जाने का तजुर्बा ना होता..!!
स्वरचित – राजीव त्रिपाठी
उदयपुर राजस्थान




