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बहुत ज़्यादा बोलने की बीमारी और सोशल मीडिया का पागलपन

मदन वर्मा

फालतू की बकवास और सोशल मीडिया का चस्का”मैं किसी को काटता नहीं, सिर्फ बात करता, दिमाग चाटता नहीं….!

नगर, देश, रोजमर्रा में और भी काम पड़े हैं, यहां किसी को बताने, जताने, मनाने की फ़ुर्सत नहीं है। लेकिन दुनिया मानती कहां है? लोग अपने को बड़ा बताने के लिए आपकी बातों को ऐसे काटते हैं जैसे कोई कसाई सब्जी काट रहा हो। आप उन्हें मूर्ख ही कहेंगे, और मैं उन्हें ‘परम मूर्ख’ की उपाधि से नवाजना चाहूंगा। ये वो प्रजाति है जो आपको शांति से अपना पक्ष रखने ही नहीं देती। इनके पेट में जैसे ही कोई तर्कसंगत बात जाती है, इन्हें बदहजमी होने लगती है। जलनवश क्योंकि आप उनसे अधिक ज्ञानी हैं, हर बात के पारखी हैं, इसलिए उनका एकमात्र उद्देश्य आपकी बात का कबाड़ा करना होता है। भई, हमें तो बात करना है तो करना है, संवाद ही तो मनुष्य को पशु से अलग करता है!

 

परंतु, कुछ लोग इस ‘संवाद’ की परिभाषा को गृहयुद्ध में बदल देते हैं। वे ज़रूरत से ज़्यादा बात करते हैं। समाज उन्हें प्यार से ‘पागल’ कहता है। वे निरर्थक बात करके लोगों का सिर इस तरह झुकाते हैं जैसे कोई भारी वजन रख दिया हो। लोग ऐसे महानुभावों से इतनी दूर रहते हैं कि उन्हें आता देख लोग सीधे रास्ता बदल लेते हैं, मानो सामने से साक्षात यमराज आ रहे हों। कुछ तो बहाना मारकर चाय पीने होटल चले जाते हैं। क्यों? क्योंकि भाई, किसी को भी अपने दिमाग में ज्ञान के नाम पर ‘भूसा’ नहीं भरवाना। सबको अपने दिमाग की मलाई प्यारी है, कोई नहीं चाहता कि इस फालतू की बकवास से उसके दिमाग के दूध का दही हो जाए!

 

खैर, जो लोग आमने-सामने दिमाग का दही करने से बच जाते हैं, वे घर आकर एक नई ‘दही हांडी’ में कूद पड़ते हैं। आजकल लोगों का दिमाग सोशल मीडिया पर अधिक है, वहीं सारी इनर्जी खपा रहे हैं। मीम्स, रील्स, चैटिंग, गेमिंग और वीडियो देखकर लोग इसके ऐसे शाश्वत आदी बन गए हैं मानो मोक्ष का मार्ग इसी पांच इंच की स्क्रीन से होकर जाता है। इसका एक फायदा तो हुआ है—अब समाज में आमने-सामने बैठकर सिर चाटने वाले लोग कम हो गए हैं, क्योंकि सब अपने-अपने कोनों में डिजिटल समाधि ले चुके हैं। यानी दुनिया और समाज से दूर हटना अब ‘मॉडर्न’ होने की पहली शर्त है।

 

अब स्थिति यह है कि अतिरेक रूप में लोग 10-12-16 घंटे इस आभासी दुनिया में बर्बाद कर रहे हैं और बड़े गर्व से अपना भविष्य अंधकारमय बना रहे हैं। यह अंधकार इतना उजला है कि रात के दो बजे भी उनके चेहरों पर मोबाइल की नीली रोशनी भूतिया चमक पैदा करती है। कंप्यूटर और मोबाइल की दुनिया में रतजगा करके सेहत खराब करना ही आज की युवा पीढ़ी का नया ‘पैशन’ बन गया है।

 

“डार्क सर्कल्स (आंखों के नीचे काले घेरे) अब बीमारी नहीं, बल्कि इस बात का मेडल हैं कि बंदा रातभर समाज सुधारने के लिए रील्स स्क्रॉल कर रहा था।”

 

मानसिक बीमार होने का रास्ता तैयार करने में इनको कोई परेशानी नहीं है। बल्कि परेशानी तो तब होती है जब इंटरनेट का रिचार्ज खत्म हो जाए। उस वक्त जो अवसाद और छटपटाहट पैदा होती है, उसे देखकर तो बड़े-बड़े तपस्वी भी शरमा जाएं। डिप्रेशन, एंग्जायटी और अनिद्रा अब कोई रोग नहीं रहे, ये तो डिजिटल नागरिक होने के ‘वेलकम बोनस’ हैं।

 

अंततः, स्थिति यह हो गई है कि लोग रीयल लाइफ में ‘हाय-हेलो’ करने से बचते हैं, लेकिन इंस्टाग्राम पर अनजान लोगों की पोस्ट पर ‘नाइस पिक डियर’ लिखने के लिए रात-रात भर जागते हैं। यदि विधाता आज धरती पर आकर पूछें कि “मानव, तुम्हारी प्रगति का क्या पैमाना है?” तो मानव मुस्कुराकर अपनी ‘स्क्रीन टाइम’ की रिपोर्ट दिखा देगा। अतः यदि कोई आपका दिमाग चाटने आए, तो उसे डांटिए मत, बस उसके हाथ में मोबाइल थमा दीजिए। वह खुद अपनी सेहत और भविष्य का कबाड़ा करने में व्यस्त हो जाएगा, और आप शांति से होटल जाकर चाय पी सकेंगे!

 

– मदन वर्मा “माणिक”

इंदौर, मध्यप्रदेश

 

दिनांक 02.07.2026

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