साहित्य

दे रहा सावन निमंत्रण

डाॅ सुमन मेहरोत्रा

आम की अमराइयों में एक डाली है झुकी सी।

आ वहीं झूला लगा लें, जिंदगी लगती रुकी सी।

 

दे रहा सावन निमंत्रण, गिर रही रिमझिम फुहारें।

झाँकता है बादलों से, भानु विह्वल हो पुकारे।

 

नाचते गाते विहग सब, पर्ण की है ओट पाये।

झूमती है सब दिशाएँ, मन में अपनी ले हुलासें।

 

आ रही है सुर सुरीली, कोई कजरी राग साधे।

चल रहा सावन का झोंका, सजनी मन को कैसे बांधे।

 

आ तुझे झूला झुलाऊ, वर्जना को तोड़ सारे।

फिर नए सपने सजाऊ, सर्जना की डोर थामे।

 

है यह झूला कल्पना का, आशा की डाली टिकी है।

रस्सियाँ विश्वास इसकी, सर्जना दोलन बनी है।

 

इस झूले पर सवार होकर, जिंदगी को नए रंग में रंगेंगे।

सावन की बारिश में भीगकर, दिल से नए गीत गाएंगे।

 

सावन की फुहारों में, दिल की बातें कहेंगे।

नए सपने सजाएंगे, जिंदगी को नया मोड़ देंगे।

 

सावन की बारिश में, दिल की गहराइयों में।

नए रंग भरेंगे, जिंदगी को नया आकार देंगे।

 

सावन के झूले, दिल को झुलाएंगे।

नए गीत गाएंगे, जिंदगी को नया नाम देंगे।

 

स्वरचित

डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’

मुजफ्फरपुर,बिहार

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