
उमड़ घुमड़कर कारे बादल छाए
दमकती बिजुरिया संग ले आए
झर झर जब बादल बरसें
हीया को मेरे विरहा तपन जलाएं
देख सखी मेरी ऋतु सावन आए।
डाल डाल पपीहा गाए
सतरंगी पंख खोल मयूर नाच दिखाए
इंद्रधनुष धरा पर खिंच जाए
मेरे पिया सखी अब तक न आए।
आंगन मेरे वृंदा लहराए
सांझ सवेरे करती वन्दना
मन में तेरी खैर मनाती
तिमिर रात्रि तेरे पग न उलझे
चौराहे जा मैंने दीप जलाए
देख सखी मन तड़पाने
फिर से ऋतु सावन आए।
ओढ़ी धरा ने धानी चुनरिया
शालि शस्य खेतों में लहराए
पोखर ताल जल-थल हो रहे
उतरी सलिला गिर मेखला से
मलय पवन मतवाला हो गाए
सखी, मेरी धड़कन बढ़ती जाए।
पंछियों का मधुर कलरव गूंजे
सुन सुन मेरा मन अकुलाए
सावन की घनघोर घटाएं
पूरे नभ पर छाती जाएं
कैसे धीर धरूं अब और सखी
परदेसी पिया अबतक नहीं आए
सावन की ऋतु जग को हर्षाए।
मेरा नयना से अश्रु बहुत जाएं।
बेला विरदी।




