साहित्य

न्याय माँगती बेटियाँ

ममता झा मेधा 

 

शीश झुका कर खड़ी है आँगन में,

आँखों में आँसू और सवाल मन में।

कौन सुनेगा मेरी ये दास्ताँ,

टूटे सपनों की ये वीराँ।

 

माँ की गोद भी अब खाली है,

बाप के कंधे पर जिम्मेदारी भारी है।

समाज पूछता है गलती किसकी थी,

बेटी तो बस बेटी ही थी।

 

न्याय के मंदिर में भीड़ लगी है,

फाइलों में उसकी उम्र घुटी है।

तारीख पे तारीख मिलती जाती है,

उम्र उसकी यूँ ही निकलती जाती है।

 

दो रोटी नहीं, हमें इंसाफ चाहिए,

जीने का हक, और विश्वास चाहिए।

बेटी बचाओ का नारा मत दो,

पहले बेटी को न्याय तो दो।

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ममता झा मेधा

डालटेनगंज

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