साहित्य

बड़े घर की बेटी प्रेम चंद जी की कहानी पर आधारित बड़ी बहू – एक लघु कथा

डॉमंजु गुप्ता

बड़ी बहू आनंदी शादी के बाद संयुक्त परिवार में खुश थी। कॉर्पोरेट दफ्तर से आकर सबको चाय पिलाक़े खुद पीती थी। घर में तालमेल बनना उसको आता था।

 

आज वो थकी-हारी लौटी। लैपटॉप का बैग रखते ही देवर अरुण भावी से बोला,

“माँ से झगड़ा हो गया। बात-बात पर टोकती हैं। अलग फ्लैट ले लूँ क्या?”

 

आनंदी ने पानी का गिलास बढ़ाया। डाँटा नहीं।

वो जानती थी – इस भागदौड़ में रिश्ते दीमक की तरह खोखले हो रहे हैं।

अहंकार, स्वार्थ से घर टूटते हैं, जुड़ते नहीं।

 

तभी पति राम आए। गुस्से में बोले, “अरुण मुंहफट है। इसे अलग कर देते हैं।”

 

आनंदी ने उनका हाथ थामा। धीरे से बोली,

“घर तोड़ना आसान है , जोड़ना मुश्किल।

बड़े घर की शान पैसों से नहीं, दिलों में प्यार से होती है। ”

“गुस्सा नाक पर धरा रहता है।”

 

“बच्चा है। मैं समझाऊँगी उसे।

संयुक्त परिवार की नींव संतुलन , समझौते से ही टिकी है।”

 

राम चुप हो गए। अरुण ने सिर झुका लिया।

तभी चार कप चाय के साथ, घर फिर जुड़ गया। डॉमंजु गुप्ता

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