
निस्वार्थ रिश्ता निभाता, वह मेरा मित्र है ।
सभी रिश्तों में यह रिश्ता, होता पवित्र है ।।
सुख दुख में साथ निभाता, बसे दिल में,
आनन्द उमंग विश्वास का, सच्चा चित्र है ।
हृदय को तृप्त करता, सरस स्नेह लुटाता,
अपने जीवन को महकाता, ऐसा इत्र है ।
अपनापन अनमोल खजाना, मित्र बिन सूना,
कृष्ण सुदामा की मित्रता जैसा, चरित्र है ।
बनके ढाल, संकट काल, खुशहाल रखता,
मित्र बिना नीरसता का अहसास, सर्वत्र है ।
मानवता का मीत, निभाए प्रीत गीत मन का,
अपना बल, निजरूप निश्छल, वह मित्र है ।।
नरसिंगाराम जीनगर निजरूप
बाड़मेर राजस्थान
©️®️




