साहित्य

शिवार्चन

डॉ. पुष्पा सिंह

शिव है सत्य शिव ही सुंदर
सारी सृष्टि शिव के अंदर,
जटा से बहती पावन धार
शिव है जग के तारणहार।

छोटी सी यह अरज हमारी
हे शिव शंकर हे त्रिपुरारी,
करिए मनोकामना पूरी
सुन लो प्रभुवर विनती मेरी।

नहीं चाहूँ मैं हीरे मोती
लक्ष्य साधती निर्मल काया,
भक्ति की देना तुम शक्ति
कृपा सिंधु तुम रखना माया।

शिव की रचना जीव सारे
देवों के महादेव हमारे
जब संकट भक्तों पर आए
शिव ने जग को तुरत उबारे।

नियमित करती दर्शन पूजन
प्रभु रखना मुझ पर तुम हाथ,
ठौर ठिकाना तेरे चरणन
आस यही तुमसे प्रभु नाथ।

गंगाजल जो शिव को चढ़ाते
अंत समय शिवपुर ही पाते,
शिव नाम की जपे जो माला
पाप भस्म शिव ने कर डाला।

रोग बला प्रभु देते टाल
खुशियों से चमके तब भाल,
भगवान अभयंकर महाकाल
नमन करूँ हर पल हर हाल।

जब भी छोड़ू मैं संसार
तेरी शरण में आऊँ मैं,
हाथ जोड़ करती गुहार
मुक्ति मार्ग अपनाऊँ मैं।
डॉ. पुष्पा सिंह

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