साहित्य

माँ की यादे

संगीता वर्मा

जब भी मुझे याद आता है
माँ का आंचल इस उम्र मे माँ
मुझे बहुत तेरी याद सताती हैं।

मेरी नटखट सी बातें सुन सुन
कर माँ का जोर-जोर से हंसना
और प्यार भारी निगाहों से देखना।

माँ गोद मे लिटाकर जब लोरी
सुनाती थी तब मै सुकून से सो
जाती थी अपने आँचल मे छुपा
लेती थी।

परियों, दादी, नानी की नई- नई
कहानियाँ सुनाती थी तब मै सपनों
मे खो जाती थी।

मै बचपन मे जब भी करती कोई
नादानी मुझे माँ माफ कर देती
थी बोलती तू अभी है छोटी।

बोलती तू तो है मेरी राजदुलारी
और हंसकर बोलती तू तो है इस
घर की महारानी।

जब भी चोट लगती थी सीने से
लगा लेती,कोई दुख दर्द होता
माँ अपने आंचल मे छुपा लेती।

मै खुशी से इतराती इठलाती माँ
की याद बहुत है आती हंसी
ठिठोली करना खिलौनो के संग खेलना।

काश माँ फिर से लौट आये और
मै बच्ची बन जाऊ लौट चंलू
अपनी माँ के आंचल मे।

बचपन में उम्र में लगे ताले माँ
ऐसी लोरी सुना दे मै बचपन मे
खो जाऊं तेरे आंचल मे छुपकर
सो जाऊं।

बदती उम्र मे माँ दुख नही सह
जाते किसकी गोद मे रोउ अब
सब बड़ा मुझे समझते ये कष्ट
भरे दिन माँ के आंचल को
तरसते है।

माँ सीने से लगती तो सब कष्ट
दूर हों जाते खुशियों से भरे दिन
फिर से लौट आते।

माँ ममता की मूरत है ईश्वर की
सूरत है दुनिया मे सबसे खूबसूरत
है माँ मुझे तेरे आंचल की जरूरत है..!!

स्वरचित एवं मौलिक
संगीता वर्मा
कानपुर उत्तर प्रदेश

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