
धरती से आसमान तक गूॅंजा ,
इसके समान नहीं कोई दूजा ।
आदिकाल से ही होती रही है ,
ये शक्ति और शौर्य की पूजा ।।
शौर्य जहाॅं स्थित वहीं शक्ति है ,
शक्ति जहाॅं स्थित वहीं भक्ति ।
तन मन सेवा भक्ति बन जाए ,
अन्यथा मानवता से विरक्ति ।।
जैसे मिलते हैं जूते का माला ,
वैसे ही मिलते हार रूपी हार ।
जो शक्ति औ शौर्य से अलग ,
होता उसको हार से ही प्यार ।।
जो करे शक्ति शौर्य की पूजा ,
शक्ति शौर्य करे उसकी पूजा ।
दोनों एक दूसरे के होते भक्त ,
उनके सदृश नहीं कोई है दूजा ।।
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।




