आलेख

शाह समाज, गौरवशाली अतीत, संघर्षपूर्ण वर्तमान और स्वर्णिम भविष्य नाम की अस्मिता और उसकी गहराई

डॉ. मुश्ताक अहमद शाह 'सहज'

​दुनिया में कुछ शब्द ऐसे होते हैं जो स्वयं में एक पूर्ण इतिहास समेटे होते हैं। ‘शाह’ एक ऐसा ही शब्द है। यह मात्र एक सरनेम नहीं, बल्कि एक रूहानी विरासत, एक सांस्कृतिक पहचान और एक उच्च सामाजिक पदवी है। आज के दौर में जब समाज की दृष्टि सतही हो गई है, तब इस नाम की वास्तविक गहराई को समझना और उसे दुनिया के सामने पूरी दृढ़ता से रखना न केवल आवश्यक है, बल्कि अनिवार्य है।
​ऐतिहासिक सत्ता का प्रतीक,जब ‘शाह’ शासन की धुरी था
​इतिहास के पन्नों को पलटें तो ‘शाह’ शब्द सल्तनतों की बुलंदी का प्रतीक रहा है।
​मुग़ल और मध्य एशियाई दौर, भारत से लेकर ईरान (परसिया) तक, यह शब्द शासकों की उपाधि रहा। शेर शाह सूरी, जिन्होंने प्रशासनिक सुधारों की नींव रखी, से लेकर नादिर शाह और शाहजहाँ तक,यह नाम सत्ता, न्याय और शक्ति का पर्याय था।
​उपाधि का महत्व,राजाओं और सम्राटों को यह लक़ब इसलिए दिया जाता था क्योंकि वे प्रजा के रक्षक थे। आज इस सरनेम को धारण करने वालों के खून में वही नेतृत्व के गुण और रक्षक की भावना निहित है।
​रूहानियत की ‘बादशाहत’,दिलों पर हुकूमत करने वाले शाह
​जब सूफी संतों और अल्लाह के वलियों ने दुनियावी मोह-माया को ठोकर मारी, तो उन्होंने इंसानी दिलों पर राज करना शुरू किया।
​रूहानी सुल्तान,हज़रत बुल्ले शाह, हज़रत वारिस अली शाह, और हज़रत मखदूम शाह जैसे बुज़ुर्गों ने सिखाया कि असली बादशाहत वह नहीं जो तख़्त पर बैठकर की जाए, बल्कि वह है जो रूह को रोशन करे।
​नाम की सार्थकता, दुनिया ने उन्हें ‘शाह’ (राजाओं का राजा) पुकारा क्योंकि उनकी एक दुआ में वह ताक़त थी जो किसी सुल्तान की तलवार में नहीं थी। इस समाज का जुड़ाव इसी पवित्रता और सेवा भाव से है।
​’फक़ीरी’ का दर्शन,, सादगी जो कमज़ोरी नहीं, गरिमा है
​समाज की सबसे बड़ी भूल यह है कि वह ‘फक़ीरी’ को ‘दरिद्रता’ समझ बैठा है।
​बेनियाज़ी,शाह समाज की फ़क़ीरी का अर्थ है ‘अल्लाह के अलावा किसी का मोहताज न होना’। यह एक उच्च स्तर का स्वाभिमान है।
​दार्शनिक पक्ष,,जो व्यक्ति सांसारिक वस्तुओं के पीछे नहीं भागता, समाज उसे ‘फ़क़ीर’ समझकर हिकारत से देखने की ग़लती करता है। लेकिन असल में, वह व्यक्ति अपनी रूह में इतना अमीर होता है कि उसे दुनियावी दौलत छोटी लगती है। शाह समाज इसी ‘खुद्दारी’ का वारिस है।
​दुआ और दवा,मानवता की दोहरी सेवा का गौरव
​शाह समाज का इतिहास केवल उपदेशों तक सीमित नहीं रहा। वे प्राचीन काल से ही ‘दुआ’ और ‘दवा’ के संगम रहे हैं।
​हकीमी विरासत,, पुराने समय में शाह (सूफ़ी) समाज के लोग न केवल आध्यात्मिक मार्गदर्शन देते थे, बल्कि वे जड़ी-बूटियों के माध्यम से जटिल रोगों का उपचार भी करते थे।
​आधुनिक फार्मासिस्ट,आज जब इस समाज का युवा डॉक्टर या फ़ार्मासिस्ट (औषधि विशेषज्ञ) बनता है, तो वह किसी नए क्षेत्र में नहीं जा रहा, बल्कि वह अपनी उसी सदियों पुरानी ‘चिकित्सा और सेवा’ की विरासत को विज्ञान के साथ जोड़कर आगे बढ़ा रहा है। यह समाज ‘मानवता को रोगमुक्त’ करने की शपथ लेकर जन्मा है।
​​साहित्य के बिना कोई भी समाज अपनी पहचान सुरक्षित नहीं रख सकता। शाह समाज ने हमेशा अपनी ‘क़लम की बादशाहत’ को जीवित रखा है।
​क़लम का रुतबा,, एक लेखक के रूप में शाह समाज का व्यक्ति समाज का आईना होता है। उसकी क़लम से निकले शब्द किसी हुक्मरान के फ़रमान से ज़्यादा असरदार होते हैं, क्योंकि वे दिलों को जोड़ने का काम करते हैं।
सामाजिक भेदभाव और उसका मनोवैज्ञानिक समाधान
​यह सच है कि कुछ संकुचित विचारधारा वाले लोग इस उपनाम को तुच्छ समझते हैं। लेकिन इसका कारण शाह समाज की कमी नहीं, बल्कि देखने वालों की दृष्टि का दोष है।
​दृष्टिकोण का अंतर: जो लोग केवल लिबास और बैंक बैलेंस से इंसान को तौलते हैं, वे कभी ‘शाह’ के व्यक्तित्व की गहराई नहीं नाप सकते।
​जवाब का तरीक़ा, इस हिकारत का जवाब नफ़रत से नहीं, बल्कि ‘इल्म’ (शिक्षा), ‘अखलाक़’ (व्यवहार) और ‘कामयाबी’ से दिया जाना चाहिए। जब एक शाह सफ़लता के शिखर पर खड़ा होता है, तो दुनिया का नज़रिया अपने आप झुक जाता है।
​भविष्य का रोडमैप,नई पीढ़ी को संदेश
​शाह समाज की वर्तमान पीढ़ी को यह समझना होगा कि उनके कंधों पर कितनी बड़ी ज़िम्मेदारी है।
​शिक्षा ही ढाल है,चाहे कोई भी क्षेत्र हो, साहित्य हो या प्रशासन शिक्षा ही वह एकमात्र रास्ता है जिससे हम अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को और अधिक चमका सकते हैं।
​संगठन की शक्ति,हमें अपनी बिख़री हुई पहचान को समेटकर एक सशक्त और शिक्षित समाज के रूप में उभरना होगा।
​हम शाह थे, शाह हैं और शाह रहेंगे
​शाह होना कोई दुर्घटना नहीं, बल्कि एक गौरवशाली विरासत का हिस्सा होना है। हमारी सादगी हमारी कमजोरी नहीं, हमारा संस्कार है। हमारी खुद्दारी हमारी पहचान है। जिस दिन हम अपनी विरासत की इस ताकत को पहचान लेंगे, दुनिया हमें हिकारत से नहीं, हसरत और इज़्ज़त से देखेगी।
​”हमारे नाम में सदियों का इतिहास बोलता है,
हमारी कलम में रूहानी अहसास बोलता है।
हमें हिकारत से देखने वालों, ज़रा गौर से देखो,
हमारी सादगी में भी बादशाहों का ताज बोलता है।”

डॉ. मुश्ताक अहमद शाह ‘सहज’
हरदा, मध्य प्रदेश

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