साहित्य

हास्य रस

संगीता वर्मा

हास्य रस काव्य साहित्य का वह रस है ,जिसे पढ़कर सुनकर मन मे हंसी, विनोद या मनोरंजन की भावना जागृत होती है। इसका स्थायी भाव हास (हंसी) है ।ये किसी व्यक्ति की वेश-भूषा भूषा, वाणी,हावभाव या विचित्र घटना को देखकर उतपन्न होता है।
रामचरितमानस हिंदी साहित्य का एक अद्वितीय ग्रंथ है, जिसकी रचना गोस्वामी तुलसीदास ने की। यद्यपि यह ग्रंथ मुख्यतः भक्ति, करुण और वीर रस के लिए प्रसिद्ध है, तथापि इसमें हास्य रस की भी अत्यंत सुंदर, मर्यादित और प्रसंगानुकूल अभिव्यक्ति मिलती है। तुलसीदास जी का हास्य न तो तीखा है और न ही व्यंग्यपूर्ण; यह सहज, सौम्य और चरित्रानुकूल है, जो कथा को जीवंत और रोचक बनाता है।
रामचरितमानस में हास्य रस का सबसे प्रभावशाली प्रसंग नारद मुनि के मोह का है। इस प्रसंग में नारद जी को अपने रूप और तप पर गर्व हो जाता है और वे स्वयं को अत्यंत सुन्दर समझने लगते हैं। जब वे विष्णु से वर मांगते हैं कि उन्हें ऐसा रूप मिले जिससे वे राजकुमारी का वरण कर सकें, तब भगवान उनकी परीक्षा लेते हैं। उन्हें वानर जैसा मुख दे दिया जाता है, परंतु नारद जी स्वयं को अत्यंत आकर्षक ही समझते रहते हैं। जब वे स्वयंवर में पहुँचते हैं और लोग उन्हें देखकर मुस्कुराते हैं, तब पाठक के मन में स्वाभाविक हास्य उत्पन्न होता है। यहाँ हास्य अहंकार के परिहास के रूप में प्रकट हुआ है।
इसी प्रकार हनुमान से जुड़े अनेक प्रसंगों में भी हल्का-फुल्का हास्य दिखाई देता है। लंका में उनके द्वारा राक्षसों को चकमा देना, अपनी बुद्धि और चतुराई से शत्रुओं को भ्रमित करना—इन सबमें एक विनोदी तत्व विद्यमान है, जो कथा को रोचक बनाता है।
वानर-सेना के संवादों में भी हास्य का सुंदर समावेश है। उनकी सरलता, उत्साह और कभी-कभी की अतिशयोक्ति पाठक को मुस्कुराने पर विवश कर देती है। विशेष रूप से जब वे अपने पराक्रम का वर्णन करते हैं या आपस में हँसी-मजाक करते हैं, तब वातावरण हल्का और आनंदमय हो जाता है।
तुलसीदास जी ने हास्य रस को अत्यंत मर्यादित ढंग से प्रस्तुत किया है। उनका उद्देश्य केवल हँसाना नहीं, बल्कि पात्रों के स्वभाव को उभारना और कथा में संतुलन बनाए रखना है। उनके हास्य में नैतिकता और संदेश भी निहित रहता है—जैसे नारद प्रसंग में अहंकार का परिहास।
अतः स्पष्ट है कि रामचरितमानस में हास्य रस भले ही गौण रूप में उपस्थित हो, परंतु उसकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह कथा को सरस, संतुलित और जीवंत बनाता है तथा पाठक को भक्ति के साथ-साथ मधुर आनंद का अनुभव भी कराता है।
संगीता वर्मा
कानपुर उत्तर प्रदेश

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