
मनोमस्तिष्क में है एक ही बात,
अंत से ही तो आया है प्रारंभ।
न आता पतझड़,न होता बसंत,
न आती मृत्यु,न मिलता पुनर्जन्म।
हर रात के बाद ही दिन का उजास होता है,
एक अवसान नये दिन का आमंत्रण है।
एक मंजिल मिली तभी कदम नई मंजिल को मुड़े,
सोपान दर सोपान यूँ ही नहीं चढ़ते,
तभी लक्ष्य पर लक्ष्य यूंँ ही नहीं मढ़ते।
स्वागत करो अंत का यही आरंभ की पुकार है।
सुषमा श्रीवास्तव, मौलिक सृजन, सद्यः निःसृत, रूद्रपुर , ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड।
31/05/26




