साहित्य

दिल की बात

राजीव त्रिपाठी

अपने एहसास को रखो ज़िंदा
अपने दिल को जज़्बात को!!
कभी ख़ामोशी से कभी कुछ
व्यक्त करो दिल की बात को!!
कौन आया है साथ देने तुम्हारा
कोई नहीं मगर दिल का साथ दो!!
इतनी जल्दी हारो मत,
अपने अल्फ़ाज़ को!!
बुलंदी पर पहुंँचाओ ऐसे,
ख़ुद की अंतिम श्वास को!!
कुछ भी नहीं होगा हासिल,
तैयार करो अपने अल्फ़ाज़ को!!
तुम स्वयं ही खींच सकते हो लकीर,
मत बढ़ने दो झगड़े की बात को!!
कभी बोलकर तो कभी रहकर
ख़ामोश,बुलंद करो आवाज़ को!!
सियासत करने लगे हैं रिश्ते
कैसे बचोगे कोई आवाज़ दो!!
रिश्ते रहे कहांँ इस दुनिया में
दूरियांँ बना लो चाहे विचार हो!!
दिल की तसल्ली के लिए
कह दो अपने दिल बात को..!!

स्वरचित- राजीव त्रिपाठी
उदयपुर राजस्थान

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