साहित्य

गुण दोष

नागेन्द्र नाथ गुप्ता

गुण केवल अपने ही दिखते हैं,
ज्यादा दोष परायों के दिखते हैं।
गुण – दोष बराबर होते दोनों में,
हम सच कहने से क्यों डरते हैं?

झाँके अपने मन के अंदर कौन,
हमऔरों की कमियाँ गिनते हैं।
ख़ुद हैं अपनी, भूलों से अंजान,
दीप दूसरों के बुझाने चलते हैं।

दोष अपने अगर पहचान सकें,
जीवन के अर्थ नए मिलते हैं।
जो करते खुद हैं मन का मंथन,
पग-पग पर उजियारे खिलते हैं।

गुण ग्राहक बनकर देखो दुनिया,
गुणीजन संदेश सनातन देते हैं।
मानवता का फूल,तभी खिलेगा,
हम जब सच को, सच कहते हैं।
नागेन्द्र नाथ गुप्ता, ठाणे (मुंबई)

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