
दफ्तर और देहरी के बीच संतुलन,
बनाना नारी को अच्छे से आता है।
तभी तो देहरी में ढेर सारा प्यार,
और दफ्तर में सम्मान दिया जाता है।
देहरी के अंदर की जिम्मेदारियां को,
नारी बड़े ही प्यार से निभाती है।
दफ्तर उसके लिए जैसे कर्म भूमि है,
उसे अपनी मेहनत से संवारती है।
दफ्तर और देहरी दोनों के करती काम,
शिकन कभी चेहरे पर लाती नहीं है।
संघर्षों की धूप में तपकर हर पल,
सफलता की नई फसल उगाती है।
दफ्तर और देहरी के बीच तालमेल,
रख कर देती सपनों को नई उड़ान।
अपने श्रम साहस और मेहनत से,
हर क्षेत्र में पाया है नया सम्मान।
सुबह रसोई और घर के सारे कार्य कर,
दफ्तर को बखूबी संभालती है।
यह नए जमाने की नई नारियां,
पल भर के लिए हौंसला नहीं हारती है।
सौ, भावना मोहन विधानी ✍️
अमरावती महाराष्ट्र।




