
पिता सदैव होता महानायक
हर बालक के जीवन का नायक,
हर मुश्किल हर कठिन समय में
संतानों का सर्वश्रेष्ठ सहायक।
श्रम परिश्रम करता आजीवन
स्वेद बूँदों से तर-बतर बदन,
अपने सुत-सुता की ख़ातिर
करता हर सुविधा का संचयन।
शिशु नौ मास माँ की कोख में
सुरक्षा पाता है अवचेतन,
जीवनपर्यंत पितृ मस्तिष्क में
कर्तव्य बोध बना रहे संवेदन।
जननी जब अन्नपूर्णा हो
शांत करें क्षुधा उदर तन-मन की,
तात कर्मठता की डोरी थाम
करे पूर्ति जीवन यापन की।
ग्रीष्म,शीत,वर्षा हर ऋतु में
अवकाश नहीं आराम नहीं।
कर्तव्य निभाने को तत्पर हर पल
कोई अल्प कोई पूर्ण विराम नहीं।
देखा है अक्सर उन्हें शांतचित्त
हर इच्छा कामना से निर्लिप्त,
सदैव रहती है हर अभिलाषा
संतान उत्थान से ही प्रेरित।
मातु यदि है प्रतिपाला
पितु भी तो हैं प्रतिपालक,
ऐसे हिम अडिग पुरुष को
नमन करते हम उनके बालक।।
स्वरचित ✍️
डॉ ऋतु अग्रवाल
मेरठ,उत्तर प्रदेश




