साहित्य

पनत्व के लिए मन की पारदर्शिता आवश्यक है,  

अपनत्व 

पनत्व के लिए मन की पारदर्शिता आवश्यक है, रिश्ते यूँ ही नहीं बनते, उनमें विश्वास आवश्यक है।

मन में छल-कपट रखकर, झूठे प्यार से जो रिश्ते बनाते हैं,

गलतफ़हमी है उनकी जब सोचते हैं कि लोग उन्हें पकड़ नहीं पाते हैं।

 

होते हैं कुछ लोग ऐसे भी जो रिश्तों को वरीयता देते हैं,

माफ कर देते हैं गलतियाँ भी, और उन्हें भनक तक नहीं लगने देते हैं।

 

बहुत मुश्किल से मिलते हैं ऐसे लोग जिनके मन में पारदर्शिता समाई है,

छल न करना उन लोगों के साथ, समझ लो जीवन में वही तुम्हारी सच्ची कमाई है।

 

खाली हाथ आए हो इस दुनिया में,

यहाँ से खाली हाथ ही जाना निश्चित है।

सत्कर्म की पूंजी यदि इकट्ठी न की,

तो मरणोपरांत भी चित्त का विचलित रहना निश्चित है।

 

मन में रखो पारदर्शिता और दैवीय गुण अपनाओ,

परमात्मा का है यह संसार, सेवा कर प्राणी मात्र की, सबके दिल में अपनी जगह बनाओ।

 

क्योंकि प्रत्येक प्राणी मात्र में है परमात्मा का वास,

इसलिए खुद भी सदा निश्छल हृदय रहने का करना प्रयास।

 

प्रेम और समर्पण बनाए रखना,

परमात्मा का सदा रहेगा तुम्हारे सिर पर हाथ।

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