
संस्कृति की पावन सरिता का, निर्मल-सा प्रवाहक पिता,
जीवन के शुभ संस्कारों का, सच्चा संवाहक पिता।
अंगुली थाम चलना सिखलाए, गिरकर फिर उठना भी,
संकट में धैर्य का दीपक बन, राह दिखाता पिता।
मर्यादा, सेवा, सत्य, धर्म का, पाठ पढ़ाता नित,
अपने आचरण से जीवन का, अर्थ बताता पिता।
त्याग, तपस्या, श्रम की महिमा, हृदय बिठाता है,
कर्तव्य-पथ पर दृढ़ रहने की, शक्ति जगाता पिता।
भारतीय संस्कृति के गौरव का, जीवित प्रतिरूप वही,
पीढ़ी से पीढ़ी तक मूल्यों को, पहुँचाता पिता।
वटवृक्ष-सी शीतल छाया में, परिवार पल्लवित हो,
घर-आँगन में प्रेम-सुधा बरसा, सुख उपजाता पिता।
माँ की ममता का संरक्षक, संतति का आधार बने,
संस्कृति-संस्कारों की निधि का, श्रेष्ठ संवाहक पिता।॥
✍️
दिनेश चन्द्र गुरुगरिया ‘द्विज’
पीसांगन अजयमेरू राजस्थान



