साहित्य

क्या विधवा होना गुनाह है?

सौ, भावना मोहन

पति के जीवन से चले जाने से,

क्यों सारी खुशियां छिन जाती है?

सफेद लिबास में लिपटा दिया जाता है,

रंगों से क्यों दूरियां हो जाती हैं?

 

क्या विधवा होना कोई अपराध है?

यह तो नियति का है एक खेल,

नारी के भी अपने अरमान होते हैं?

जीवन क्यों बना दिया जाता है जेल?

 

पैरों में बांधी रिवाजों की जंजीरें,

फिर भी चट्टान सी खड़ी रहती है।

दुनिया के सारे तानों को सुनकर भी,

घर आंगन की जिम्मेदारी लेती है।

 

अंतर्राष्ट्रीय विधवा दिवस पर,

नारी का भी अस्तित्व पहचानें।

पति से क्यों पहचान हो नारी की?

उसका जीवन भी अनमोल माने।

 

समाज को अब विचार बदलने होंगे,

एक नई सोच अपनानी होगी।

विधवा नारी भी स्वतंत्र जीवन जिए,

समाज में उसकी भी भागीदारी होगी।

 

सौ, भावना मोहन विधानी ✍️

अमरावती महाराष्ट्र।

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