
तन को नहीं किरदार को महकाओ तुम।
हमेशा प्रेम का दीपक ही जलाओ तुम।।
दुआ लो और दुआ दो यही काम हो तुम्हारा।
छूटे रिश्तों को जरा फिर से गले लगाओ तुम।।
2
जो वादा किया उसको जरूर निभाओ तुम।
मत किसी की राह में कांटे बिछाओ तुम।।
दर्द में हर किसी के हमदर्द बनो तुम जरा।
अंधेरों में किसीको जरा रोशनी दिखाओ तुम।।
3
तुम्हारे बिगड़े बोल न कभी दुर्व्यवहार बने।
कभी किसीके दुख का नहीं आप आधार बने।।
बनना है तो बने डूबते को तिनके का सहारा।
सिखाओ बच्चों को कि भविष्य के कर्णधार बने।।
4
हो सके जितना प्रेम के ही गीत सुनाओ तुम।
भूलकर भी नहीं नफरत की दीवार उठाओ तुम।।
अपनी करनी का भी फल-कुफल मिलता जीवन में।
बाद जाने के भी सबको बहुत याद आओ तुम।।
रचयिता।।एस के कपूर “श्री हंस”
बरेली।।
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