
में वहां अवश्य मिलूँगी, अमृता प्रतीम मुझे याद आ गया अमृता प्रतीम जी के वो शब्द ईश्वरीय आत्मा विश्वास भरा हुआ कितनी सार्थक और परम सत्य कि जहां भी पावन पवित्र रूह का दिल और दिमाग में वास होगा मैं वहां अवश्य दस्तक दूंगी
आज जब जीवन व्यतीत करते हुए
सदा ही कर्म शील हो सतत् सक्रिय हो सृजन धर्म में लगा हुआ दुनियां की भीड़ से अलग एकांत में दस्तक दे लेखन को ईश्वर कृपा आशीष मान निर्विकार भाव से सम्मानित और चाह से दुनियां के रूप और यौवन की दौड़ से कोसों दूर चलते
जीवन व्यतीत करते है आज पता ही नहीं चला मंजिल यहां तक चली आई सोच हैरान हूं, याद आता है मुझे मेरे मित्र की अक्सर दस्तक देती अमृता प्रतीम जी के शब्दों को अमर विचारों की बात करते हुए तब भी इतना ध्यान नहीं दिया क्योंकि सहित्य जगत में भला ऐसा कोण नहीं जो अमृता प्रतीम जैसे महत्वपूर्ण हस्ती की सहित साधना और तपस्या से निष्ठा और समर्पण से रूप ओर यौवन के मोह से कोसों दूर रहता हुआ जीवन सार्थक करते हुए देश में समाज को नारी शक्ति पर उसके महत्व और अस्तित्व पर उसकी कोमल भावनाओं और संवेदना पर दस्तक दे इतना प्यार आदर करता हो कितना कुछ दे गई
वह अमृता प्रतीम सम्मान आदर और उसके महत्व पर प्रकाश डालता व्यतित्व
बस वैसे ही रिश्ते से बंधा हुआ था मेरा रह प्रेम जो सदा ही एक दूसरे की चिंता और खया करता हुआ दोस्ती की पावनता का इतिहास रचा गया
आज हां आज जब मेरे लेखन सृजन की पावनता और पवित्रता पर दस्तक देता हुआ अमृता प्रतीम सम्मान मिला तो मन आत्मा आत्म विश्वास से भर गई और सोच ईश्वर है अवश्य है जो यदि नीयत साफ़ हो मन आत्मा शुद्ध हो कर्म पथ पर दस्तक दे मानव मात्र पशु पक्षी से प्यार करते हो जीवन व्यतीत करें तो जीवन कभी भी अकेलेपन का अहसास नहीं होता हैं
कहते है कि यदि नीयत साफ़ है तो ईश्वर साथ है कितना कुछ आज देख रहा हूं और हैरान हूं सचमुच ईश्वरीय शिक है दुनियां में जिंदा और वही सब कुछ देखती हैं और इंसान को उसके कर्म का अहसास कराती हुई बांट देती हैं बिना कोई चाह के चुपचाप बिना दस्तक देते हुए
सब कुछ महसूस कर रहा है यह मन आत्मा सोचा इस ईश्वरीय परम् सत्य से परिचय कराया जाय सभी को कि नीयत साफ़ होगी मन आत्मा शुद्ध होगी तो देर से ही सही
आपको जिस उपदेश से दुनियां में भेजा है वह सार्थक कर सुख सुकून मिलेगा और मन आत्मा निर्विकार भाव से सहज सरल जीवन व्यतीत करने को ही सुकून महसूस करेगी
धन्य है धरा पर दस्तक देती पावन पवित्र रूह ईश्वरीय तुल्य आशीष जो सदा ही कर्म शील व्यक्ति के साथ रहते हुए सुकून देती हैं और जीवन कभी भी अकेलेपन का अहसास नहीं करती है
वंदन सत् सत् वंदन पूज्य आराध्य रूह शक्त को ईश्वरीय तुल्य आशीष को
डॉ रामशंकर चंचल
झाबुआ मध्य प्रदेश




