
विधा कविता
शीर्षक आषाढ़ महीना
आषढ़ का महीना आया अपने साथ लाया बहार,
छाई घटा, भीगी धरा, महकी पवन बयार,
बरखा की बूंदों में घुला है मीठा-मीठा प्यार।
पत्तों पर मोती सजे, धरती ने ओढ़ी धानी चूनर,
हरियाली के आँगन में, खिली है प्रीत की चुनर।
माटी की खुशबू उठी, जैसे तेरा ही हो संदेश,
मिलन की इस रुत में, सँवर गया मेरा हर वेश।
भींगते हैं तन-मन यहाँ, धड़कनें जाती हैं मचल,
बरखा और हरियाली का यह मौसम, है प्रेम का महाँचल आषाढ़ का महीना आया।
इस मौसम की मदहोशी में, मेरा भी बस यही पैगाम,
बरखा की बूँदें तुम पर बरसाएं खुशियों का मुकाम।
आषाढ़ का महीना आया, संग अपने जल अपार लाई, सूखे खेत-खलिहानों में हरियाली लाई।
तपती धरती की आग बुझाई,
बरखा संग अपने कृषकों के मुस्कान लाई।
सूख रहे पेड़ों में. मस्ती-सी छलकाती आई है बरखा, बिजली का झूल गया रेशमी अंगरखा! कुहरे की नरम-नरम चादरें लपेटे, सूरज भी दुबक गया धूप को समेटे। कैसे टिकता, आखिर बोझ था उमर का! बादल की बादल से हो गई लड़ाई,बरखा हरियाली और प्रेम
संदेश लाई आषाढ़ का महीना आया।
स्वरचित
संगीता वर्मा,कानपुर उत्तर प्रदेश




