साहित्य

अंधविश्वास 

वीणा गुप्त 

रमानाथ के दादाजी लंबे समय से  बीमार चल रहे थे। इलाज हो रहा था। पर उनकी तबीयत में कोई खास सुधार नहीं  दिख रहा था। दादी रोज मंदिर जा रहीं थीं। मन्नतें  मना रही थीं। वहीं के एक पंडित ने उनकी समस्या का आसान हल सुझाया। ग्यारह दिन तक किसी  गरीब को  सुबह का भोजन करवाओ, तो बीमारी   ऐसी रफूचक्कर हो जाएगी कि दादाजी सेंचुरी लगाए बिना बोल्ड नहीं  होंगे। सारे कुपित ग्रह -नक्षत्र  शांत हो जाएंगे। दादी ने यह अचूक उपाय घर वालों को

बताया।,”ग्यारह दिन तक मुझसे तो नहीं बनाए जाएंगे छप्पन भोग।” रमा की माँ ने साक्षात चंडी का रूप धारण करते हुए इसका विरोध किया। पर रमा श्रवण कुमार टाईप पोता था। उसने एक खाना बनाने  वाली का इंतजाम  किया और किसी गरीब  को ढूँढने निकला। एक- दो गरीब दिखे भी, पर रमा इस बारे  में कोई रिस्क नहीं  लेना चाहता था।  दादाजी की सेहत का सवाल जो था।  कन्फर्म करने  के लिए उसने एक से पूछा भी ,

” भैया क्या आप गरीब हैं?”

उस गरीब ने उसे खा जाने वाली नजरों  से धूरा और ऐसे -ऐसे शिष्ट वचन सुनाए कि रमा का सारा उत्साह  टूट गया। क्यों न पंडित जी से ही इस बारे में पूछा जाए। यह सोच कर उसने  मंदिर का रास्ता पकड़ा। वहाँ जाते ही उसकी इच्छा  पूरी हो गई । हर उम्र और रूप- रंग के गरीब मंदिर  के बाहर  डेरा लगाए बैठे थे।  रमा उनमें  से  सुपर गरीब ढूँढने लगा। एक को चुना और उसके पास जाकर खड़ा हुआ। भिखारी अपने  नकली घावों से मक्खियाँ उडा़ रहा था। पास ही उसकी बैसाखी  पडी़ थी। सामने मैला सा कटोरा था, जिसमें दो एक नोट और रेज़गारी पड़ी थी।  रमा को देखते ही वह गिड़गिड़ा कर कुछ बोला और अपना कटोरा उसकी ओर बढाया।   “भैया, मैं आपसे  कुछ बात करना चाहता हूँ। क्या दो मिनट देंगे? “रमा ने कहा।

भिखारी  ने अपने  दाँत दिखाए और चेहरे पर परम दयनीयता लाते हुए, अपना कटोरा फिर उसकी ओर बढाया। उसे दस का नोट देते हुए रमा ने फिर अपनी  बात दोहराई।  भिखारी बोला, ” क्या बात है साहब? ” रमा बोला, कल से  लेकर ग्यारह दिन तक मैं  तुम्हें  रोज सुबह  अपने  घर में  भोजन करवाना चाहता हू़ँ। दान- दक्षिणा भी दूँगा। तैयार हो तो कहो, नहीं तो किसी  दूसरे भिखारी से  बात करुँ।”  भिखारी का स्वाभिमान  चोट खा गया। “भिखारी मत बोलो साहब। यह हमारा पेशा है । लोगों  को दिन -रात दुआएँ देते हैं । गर्मी- सर्दी कुछ नहीं देखते।जी तोड़ मेहनत करते हैं, तब जाके कुछ पैसा कमाते हैं। भीख नहीं माँगते।”

“गलती हो गई भैया। पर अब मेरी बात का जबाब दो।” रमा बोला।

“ठीक है। आपकी बात मान लेता हूँ, पर आपके घर आना- जाना ——।”

“तुम उसकी चिंता मत करो। तुम्हें ले जाने और यहाँ छोड़ने का काम मेरा। हाँ, जरा हुलिया ठीक  कर लेना। कल सुबह आठ बजे आऊँगा। ”

अगले दिन जब रमा वहाँ पहुँचा तो भिखारी एकदम चकाचक था। उसके हाथ- पैरों के घाव गायब थे। ” कमाल है, एक ही  रात में  तुम्हारे घाव  कैसे ठीक हो  गए। ”  उसने  हैरानी से  पूछा। ” पेशे का सीक्रेट है  साहब। मत पूछो।  ” कह कर वह  रमा की गाडी़ में  बैठने लगा। “अरे अपनी  बैसाखी तो ले  लो।”रमा बोला। “उसकी कोई जरुरत नहीं  साहब। ” वह लंगडा भिखारी  अपने  दोनों  पैरों से चलकर गाडी़  में  बैठ गया।   रमा की दादी ने ग्यारह दिन तक पूर्ण श्रद्धा  से  भोजन कराया। रोज इक्यावन रुपए बतौर दक्षिणा दिए।  ग्यारहवें दिन उसे  कुरता- पाजामा, उसकी पत्नी  के लिए  साड़ी और एक सौ एक रुपए देने लगीं तो भिखारी  भड़क गया।

 

” यह क्या अम्मा, भिखारी  समझा है  क्या? जो सौ रुपल्ली में टरका रही हो।” रमा की माँ को  उसकी  बात सुनकर  गुस्सा आ गया।

 

“तू भिखारी  नहीं,  तो क्या कोई  कलेक्टर  है ? इतने दिन खिलाया- पिलाया, गाडी  में  बिठाकर लाए। एहसान मानना तो दूर, तेवर दिखाता है ।”

“अरे अम्मा जी, एहसान तो आपको मानना चाहिए मेरा, जो अपना काम छोड़कर यहाँ आया। ठिए पर बैठता, तो रोज पाँच सौ कमाता।” भिखारी  की आवाज ऊँची होती जा रही थी। अड़ोसी- पडो़सी  तमाशबीन  बनने को तैयार होने लगे थे।

“अरे मम्मी ,तुम भी क्या इसके  मुँह लगती हो। लोग क्या कहेंगे  कि ये  तो  भिखारियों से भी लड़ते हैं। ”

रमा ने  माँ को समझाया। वह चुप हो गईं।  रमा की दादी भिखारी  से लेन- देन पर बारगेनिंग कर रही थी।

“अम्मा जी, आपके कहने पर मान जाता हूँ। पाँच हजार रुपये दे दो और मुझे छुट्टी दो,।” भिखारी कंम्प्रोमाईज करना चाहता था।

“पांच हज्ज़ार” दादी का मुंह खुला का खुला रह गया। फिर, क्या ज़माना आ गया है।” बुड़बुड़ाती दादी अंदर चली गईं और रमा ने भिखारी को  किसी तरह तीन हज़ार  पर मना लिया। इधर तीन हज़ार  लेकर  भिखारी  गाड़ी में  बैठा ही था कि तभी अंदर से दादी के जोर से रोने-चीखने की आवाज़ आई। रमा के दादाजी चल बसे थे। सारे ग्रह- नक्षत्रों की साजिश रंग लाई थी और पंडित जी का अचूक नुस्खा  पूरी तरह फेल हो  गया था।

 

वीणा गुप्त

नई दिल्ली

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