साहित्य

दिल छलनी हो गया

सौ, भावना

एक बार नहीं दिल रोया मेरा कई बार,

जब मां पर हुआ गालियों का प्रहार।

किस माता-पिता की संतान थे वो,

कैसे दिए गए थे उनको संस्कार?

 

आज की पीढ़ी भविष्य है कल का,

प्रयोग नहीं कर सकते इनपर बल का।

हक है इनका सवाल आवाज उठाना,

पर हक नहीं किसी को इतना गिराना।

 

नीट पेपर का तुम समाधान मांगते,

शालीनता से हक की आवाज उठाते।

देश के प्रधानमंत्री पर लांछन लगाना,

भाया नहीं देश की गरिमा को गिराना।

 

जंतर मंतर पर देखी हरकतें तुम्हारी,

टूट गई वहीं पर तुमसे उम्मीदें सारी।

ऐसी युवा पीढ़ी क्या देश चलाएगी?

पल भर में देश की नैया डूबाएगी।

 

तरस आता है इनके मां बाप पर मुझे,

उनकी तो सारी उम्मीदों के दीप बुझे।

बेटी के कारण नौकरी पद गंवाना पड़ा

दुनिया से अपने मुंह को छुपाना पड़ा।

 

विरोध करो पर अपशब्द नहीं बोलना,

सबको एक ही तराजू में ना तौलना।

विद्यार्थियों को न्याय मिले यही पुकार,

पर शब्दों में होना चाहिए संस्कार।

 

सौ, भावना मोहन विधानी ✍️

अमरावती महाराष्ट्र।

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