
शिक्षित सब है घूमते, मिले न कोई काम।
शिक्षा के अनुकूल अब, मिले कहाँ है दाम।।
सुरसा सम मुंँह खोलती, महंँगाई की मार।
सूनसान थाली दिखे,दीन-हीन लाचार।।
बड़े-बड़े जो लोग हैं, चला रहे उद्योग।
उनको ही सरकार भी, करवाती सुख भोग।।
शिक्षित होकर इस जगत, करो कर्म अतिरेक।
जागृत मानस में रखो, विद्या बुद्धि विवेक।।
संकल्पित हो कीजिए,हर हाथों हो कार्य।
रोजगार या नौकरी,विषय बड़ा अनिवार्य।।
मुख्य समस्या मानकर,सोचे अब सरकार।
घूम रहे बेकार में,युवा बेरोजगार।।
धरे हाथ पर हाथ को, समय करो मत नष्ट।
काम सदा करते रहो, दूर सभी हो कष्ट।।
करते श्रम दिन-रात है, फिर भी मंजिल दूर।
पैसों में पेपर बिके, योग्य हुए मजबूर।।
कलयुग के शिक्षा बनी, बहुत बड़ा व्यापार।
निर्धन जो माता-पिता, सहते कष्ट अपार।।
नहीं तुम्हारे घर कभी, आएगी सरकार।
स्वयं कर्म करते रहो,मानो कभी न हार।।
श्रम का फल निश्चित मिले,रखना हरदम ध्यान।
होना नहीं निराश तुम, लक्ष्य करो संधान।।
आत्मदाह कायर करें,खो देते हैं जान।
मानव जीवन की नहीं, यह कोई पहचान।।
शिक्षा तो अनिवार्य है, देती सारे ज्ञान।
शिक्षित होकर तुम सदा, सफल करो अभियान।।
डॉ गीता पांडेय अपराजिता
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेशडेय अपराजिता
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश




