साहित्य

गाँव महिमा

डॉ.उदयराज मिश्र

हसरतें बढ़ती गईं चाहत की छाँव में।
अब भी बचा है प्यार थोड़ा सा गाँव में।।

वो झुरमुटों के झुंड पगडंडियों की राहें –
अब भी कहींकहीं पर दिखती हैं गाँव में।।

शहरों में नीर नाम से बिक रहा है पानी –
मिलता है वही मुफ्त में अब भी गांव में।।

शहरों की शर्त एक यही हम हमीं तो हैं –
रिश्तों की बड़ी कद्र है अब भी गांव में।।

रिश्तों को दफ्न करके शहरों में जो बसे –
उनके लिए दुआएं भी होती हैं गाँव में।।

– डॉ.उदयराज मिश्र

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