साहित्य

  • मृत्यु मेरी मित्र है

    मृत्यु मेरी मित्र है, जीवन की सहचर है, डर की धुंध हटाकर सच का सुंदर घर है। जब थक जाएं…

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  • फायकू : नई सदी की संवेदना का सशक्त स्वर

    समकालीन हिन्दी साहित्य निरंतर परिवर्तनशील है। समय के साथ अभिव्यक्ति के नए रूप सामने आते रहे हैं, जो समाज की…

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  • सीमाएँ

    सीमाएँ सीमाएँ है आईने की भी जो सब कुछ नहीं बताता जो सामने आता है उसके उसको वैसा ही दिखा…

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  • निर्णय

    शहर के एक प्रतिष्ठित विद्यालय में वार्षिक समारोह था। मंच पर मेधावी छात्रों को सम्मानित किया जा रहा था। “इस…

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  • रिश्ते नाते

    आज नहीं फिर किसी दिन रिश्ते नाते धोखा हर दिन!! हम पर यह इल्ज़ाम है आया कितने धोखे खाएगा दिल!!…

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  • ग़ज़ल

    खुद ही खुद में रहने दो थोड़ा – बहुत विचरने दो लोग कहां पहचानेंगे, चेहरा उसको रंगने दो। खुशबू जिसमें…

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  • शिव महिमा

    शिव शंकर के द्वारे गूंँजें भक्ति भाव उद्गार। श्रद्धा से जो शीश झुकाता, होता भाव से पार।। शुभ त्रिपुंड मस्तक…

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  • ज़िन्दगी

    बहुत थक गया हूँ ज़िन्दगी का बोझ, ढोते ढोते, सफर में मिला, बहुत कुछ, चलते चलते, कुछ खट्टी, कुछ मीठी…

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  • जय शिव शंकर भोले

    चंद्र सुशोभित जिनके सिर पर, हे भोले भण्डारी । रुद्र अक्ष उर माल अलंकृत, पद्मासन त्रिपुरारी ।। कंकर कंकर पत्थर…

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  • कविता

    बिन करुणा के मानुष केवल माटी की एक काया है, जिसने प्रेम न बांटा जग में उसने सब कुछ गंवाया…

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