साहित्य
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बेरोज़गार का चीत्कार
ख़ामख़ाँ उत्सव मनाया सफलता का जग में कर में लिए प्रशस्तिपत्र ठोकरें खा रहा क्यों मेरी भूख से कोई भयभीत…
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दुश्मनों की तरहा
वो जिनको चाहा था कभी हमने पागलों की तरहा याद आये है वही आज हमको दुश्मनों की तरहा वो लिखे…
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इन घुमड्ते बादलों का
इन घुमड्ते बादलों का क्या करे अब नहीँ दिखती चमकती बिजलिया नाव काग़ज़ की नज़र आती नहीँ अब नहीँ बच्चे…
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संस्मरण …. आज तुम्हें लिखती हूँ…
पिछली बार जब मैं गुवाहाटी से गई थी तो यहाॅं पर मेरे पतिदेव थे और यहीं उन्होंने चिर शांति वरण की…
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ग़ज़ल
ज़िन्दगी जीते रहे माता- पिता। पालते बच्चे रहे माता – पिता। हो गये बच्चे सयाने फिर भी तो, दर्द को…
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हर धड़कन में
हर समय तुम होती हो किस पल की बात करूं हर शाम तुम संग मुस्काता हूं किस शाम की में…
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कौन किसके साथ है देर तक
कौन किसके साथ है देर तक फूल की खुशबू भी देर तक नहीं रहती धूप की रंगीनियां भी नहीं रहतीं…
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परी पापा की
*परी पापा की* ************** कल तक थी मैं -परी पापा की आज —तुम्हारी प्रिये हूँ मैं, कल तक थी…
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वो बचपन के दिन अच्छे थे
वो बचपन के दिन अच्छे थे जब कागज के जहाज में अमेरिका, लंदन घूम आते थे, कागज की कश्ति जब…
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दिसम्बर आ गया
“दिसम्बर आ गया” हो गई ठिठुरन सुबह और शाम को, कंपकंपाता शीत है, तन-जान को, ओस पड़ती और कोहरा छा…
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