साहित्य
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मिट्टी का परिंडा
आँगन की धूप तपी है, झुलस रहा है बाग़, चिड़िया की चोंच सूखी है, प्यासा है कुत्ते का मुख।…
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कर्तव्य और अधिकार
*अधिकार* बोला ऊँची छत से – “मैं आसमान हूँ, मुझे पाने की ज़िद कर!” *कर्तव्य* बोला मिट्टी से लिपटकर –…
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खामोशियों में छिपा प्रेम
प्रेम कभी शब्दों का मोहताज नहीं होता, वह तो आँखों की झुकी पलकों में, बिना कहे किए गए इंतज़ार में…
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सिस्टम की लापरवाही
सड़कें रोईं, गलियाँ रोईं, रोया मालवीय नगर का बाज़ार, चंद सिक्कों की ख़ातिर तुमने, लील लिया हँसता संसार। जब तक…
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खोता हुआ बचपन
आज मेरा बच्चा मेरी गोदी में सोता नहीं, गिल्ली-डंडे और कंचों के लिए जिद कर रोता नहीं। वह मोबाइल की…
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कागज़ी टास्क फोर्स नहीं जमीनी जनआंदोलन
कागज़ी टास्क फोर्स नहीं, जमीनी जनआंदोलन चाहिए: तभी बचेगा बचपन — कुमुद रंजन सिंह, अधिवक्ता, पटना उच्च न्यायालय प्रतिवर्ष 4…
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घर की धुरी
नारी हर घर की धुरी थी, हर घर का मजबूत आधार थी। हर रिश्ते की सच्ची डोर, हर खुशियों का…
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मिट्टी से मोहब्बत
जब सुबह की धूप आँगन में उतरे, हाथ में खुरपी, मन में उम्मीद। एक बीज धरती की कोख में रख…
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दो जून की रोटी
सूरज से पहले जाग उठे, फिर श्रम का दीप जलाते हैं, दो जून की रोटी खातिर, सपनों को रोज़ गलाते…
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दो जून की रोटी
दो जून की रोटी, जीवन की जरूरत। जिसके लिए लोग, दिन-रात मेहनत करते। भूखे पेट की आग, ज्वाला से…
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