साहित्य

बुझा दो शमां

प्रिया काम्बोज प्रिया

बुझा दो शमां वो आए हम लाजवाब हो गए
महफिल में मेरी रौनक ए महताब हो गए

रूह में उतर मिल गए जब मेरे सनम
चिलमन हटा के फिर वो बेनकाब हो गए

प्यार भरी मीठी उसकी बातें जो सुनी
झड़ते हुए से पंखुड़ी गुलाब हो गए

अंदाज कातिलाना से जो देखे वो हमको
हम हुए शबनम से वो शबाब हो गए

आंखों से पिलाई जो शब यार ने हमे
वो मयकदा हम जाम ए शराब हो गए

अब तक छुपा के रखा था खुद को जमाने से
देखा जो प्यार से तो बेहिजाब हो गए

रखी है संभाल कर तेरी यादें हैं मेरे पास
ना जाने कितने किस्से लिखे किताब हो गए

सभाल के रखें है आज भी तेरे पन्ने
मिलों कभी पुराने वो हिसाब हो गए

आगोश में आते हैं वो इस क़दर
हम पिघल मोम के सैलाब हो गए

याद आते हैं जब वो सुनहरे गुजरे पल
बंद आंखों में तुम महकता ख्वाब हो गए

प्रिया काम्बोज प्रिया ✍🏻
सहारनपुर उत्तर प्रदेश

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