खाट बिछा जब बैठते थे,
हम आंगन द्वारे में.
खुली. खुली छज्जे से
गिरते बरसाती धारे में।
यहीं खाट पर बैठ कभी,
बाबा गिनती पढवाते थे।
न आने पर कभी. कभी
उठक बैठक लगवाते थे।
बाटी चोखा अक्सर बाबा,
द्वार पे ही भुनवाते थे.।
दाल बाटी चोखा खाते,
हम सब बैठ ओसारे में।
आँगन के गमले में एक,
नन्हा पौधा उग आया था।
माँ बोली तुलसी माता हैं,
उसपर फूल चढाया था।
रोज साँझ को उसपंर माँ,
दीप जलाया करती थी।
फिर हम सब ढिबरी रखते,
घर, आँगन गलियारे में।
आज वो गमला नहीं दिखा,
टूटी खाट उपेक्षित है।
खेती बाड़ी के नवनव,
उद्यमो से सब प्रशिक्षित हैं।
पर खेती में मन न लगे,
पिज्जा, बर्गर भरा भंडारे में।
संगीता श्रीवास्तव




