साहित्य

मेवाड़ी मिट्टी की शान (आल्हा छंद)

डॉ० अर्जुन गुप्ता

वीर अनुपम बलिदानी,

मेवाड़ी मिट्टी की शान।

अकबर की सेना के आगे,

झुकी नहीं राणा की आन॥

 

ईस्वी पंद्रह सौ चालीसा,

मई नवीं शुभ वासर श्रेष्ठ।

महाप्रतापी राणा जन्मा,

शुक्ल तृतीया अनुपम ज्येष्ठ॥

 

मेवाड़ी धरती पर जन्मा,

कुंभलगढ़ था दुर्ग विशाल।

उदय सिंह राणा जयवंता,

मातु-पिता तब हुये निहाल॥

 

मुगलों की सत्ता के सम्मुख,

नतमस्तक थे दुर्ग महान।

सनातनी सत्ता पर हरदम,

करता था राणा अभिमान॥

 

शौर्य शील साहस संग्रामी,

मातृभूमि का अमर सपूत।

वंश शिरोमणि सिसोदिया का,

पौरुष जिसके पास अकूत॥

 

हल्दीघाटी समराँगण में,

राणा ने मारी फुँकार।

कूद पड़ा चेतक पर कीका,

रण में करता जय जयकार॥

 

धूल चटाया अरि सेना को,

भाग गये मुस्लिम सम्राट।

राजपूत कौशल के आगे,

अकबर भूला अपना ठाट॥

 

गाथा अमर रहे झाला की,

दिया अमर उसने बलिदान।

उत्सर्जित करके निज तन को,

किया निछावर अपनी जान॥

 

राज्य-मुकुट था राणा के सिर,

पहन लिया वह अपने भाल।

टूट पड़ी अकबर की सेना,

समझ उन्हें राणा विकराल॥

 

प्राण बचाया था राणा का,

अद्भुत साहस हृदय विशाल।

नाम रहेगा सदा अमर वह,

झाला माना वीर निराल॥

 

ग्रास घास की खाया वन में,

झुका नहीं राणा अभिमान।

देशभक्ति रग-रग में व्यापक,

अद्भुत बांका वीर जवान॥

 

अश्व अमर अनुपम था चेतक,

बलशाली राणा का भक्त।

पार कराया दुर्गम नाला,

पर खुद ही वह हुआ असक्त॥

 

मुगलों की ताकत को राणा,

तलवारों पर रखता तोल।

शीश झुकायें नित दिन शुभ हम,

गाथा है जिसकी अनमोल॥

 

वीर प्रसूता है यह वसुधा,

अद्भुत वह माई का लाल।

धन्य-धन्य मिट्टी मेवाड़ी,

अमर रहें राणा चिरकाल॥

 

© डॉ० अर्जुन गुप्ता ‘गुंजन’

प्रयागराज, उत्तर प्रदेश

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