
ड़िया नीचे लालटेन में,चूल्हा रोटी अच्छी थी।
नील लगी जब पहने बाबू,धोती मोटी अच्छी थी।।
अम्मा गुड़हल रोज चढ़ाती,तुलसी और शिवाला पर।
दूध कभी जब पतला आता,भड़के अक्सर ग्वाला पर।
दूर बहाता नलका पानी,पीतल टोटी अच्छी थी।
मड़िया नीचे लालटेन में,चूल्हा रोटी अच्छी थी।१।
लीपे चूल्हा भोर सांय जब,अदहन वाली दाल बने।
पांच कभी दस पैसे मिलते,लगता मालामाल बने।।
सिकड़ी कंचा खेल खेलते,खुशियां छोटी अच्छी थी।
मड़िया नीचे लालटेन में,चूल्हा रोटी अच्छी थी।२।
छुट्टी गर्मी की जब होती,आम खवाई होती थी।
पेंग मारते झूला झूलें,घर खाट चटाई होती।।
लूडो कैरम गिट्टा वाली,सारी गोटी अच्छी थी।
मड़िया नीचे लालटेन में,चूल्हा रोटी अच्छी थी।३।
पीपल निमिया छांव दुआरे,पंचौ के चौपाल लगे।
गौना बरही सादी मुंडन,दुनिया के जंजाल लगे।
फीता वाली रंगबिरंगी,दीदी चोटी अच्छी थी।
मड़िया नीचे लालटेन में,चूल्हा रोटी अच्छी थी।४।
डाॅ.राजेश श्रीवास्तव राज
गाजियाबाद




