साहित्य

सतत् प्रणाम पूज्य राज जी 

डॉ रामशंकर चंचल 

आज तुम्हारी तिथि है

तुम्हें दुनियां को छोड़े

चालीस साल हो गए

फिर तुम्हारे आशीष से

दूसरी प्रिय साथी मिली

उसने भी मुझे छोड़ दिया

और मैं फिर अकेला

फिर देखता हूं

तुम दोनों के आशीष का

एक ईश्वरीय रूप

रूह को, जो भी मुझे छोड़

चली गई और आज

तुम सभी के न होने के

बावजूद, जीवन में

सदा ही यह अद्भुत

अहसास बना हुआ है कि

तुम सब छोड़ कर भी

सदा ही मेरे साथ हो

जिसे हर पल

महसूस करता हुआ

जीवन सार्थक करने में

लगे हुआ हूं

तुम सभी ईश्वरीय आशीष को

सदा ही वंदन करते

महसूस करते हुए

बस कुछ नहीं चाहिए

बहुत है यह

सुखद अहसास जो

शेष जीवन को

सतत् सक्रिय रखें है

आज के इस दिन को

सतत् प्रणाम करता हूं

तुम सभी को सत् सत् वंदन

ईश्वर कृपा और तुम सभी का

प्यार और आशीष बना रहे

 

डॉ रामशंकर चंचल

झाबुआ मध्य प्रदेश

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