
आज सुनाती हूँ उस देवी की गाथा, जो थी साहस का अवतार।
सुख-वैभव को ठोकर मारी, चुना मौत का साया था,
नीरा आर्य ने भारत माँ पर, अपना सर्वस्व लुटाया था।
आजाद हिंद की सेना में, वो झांसी की रानी थी,
आँखों में अंगारे थे, और लहू में तरुणाई थी।
पति ने जब गद्दारी की, और नेताजी पर वार किया,
क्षण भर भी ना सोचा नीरा ने, सीने के पार कटार किया!
मांग का सिंदूर पोंछ डाला, देश के स्वाभिमान में,
पति को खुद ही मार दिया, बस वतन की आन-बान में।
गिरफ्तार हुई वो वीरांगना, फिर जेल में जुल्म ढाया गया,
गोरे जल्लाद के हाथों से, काल का खौफ दिखाया गया।
जेलर बोला- “बता कहाँ हैं बोस? तुझे हम छोड़ देंगे,”
“वरना तेरे शरीर की हड्डियाँ, अभी हम तोड़ देंगे।”
नीरा बोली- “वो तो मेरे दिल में बसे हैं, वहीं मिलेंगे,”
दुष्ट ने हँसकर कहा- “तो फिर ये दिल और जिंजर भी छिलेंगे।”
छैनी और हथौड़े चले, उस कोमल काया पर,
स्तन काट दिया जालिम ने, पर आंच न आने दी साया पर!
चीख दबी थी कंठ में, पर आँखों में स्वाभिमान था,
हर कतरे में खून के, बस “जय हिंद” का गान था।
आजादी आई देश में, पर नीरा गुमनाम रही,
फूलों की इक टोकरी, उस देवी की पहचान रही।
हैदराबाद की गलियों में, वो फूल बेचकर सो गई,
बिना पदक, बिना पेंशन, वो इतिहास में कहीं खो गई।
ए भारत के वासियों! आज उन्हें प्रणाम करो,
नीरा जैसी वीरांगना का, दिल से तुम सम्मान करो।
वो जासूस नहीं, वो भारत की अमर कहानी है,
आजादी के महायज्ञ की, सबसे बड़ी कुर्बानी है!
गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं आप सभी को🇮🇳🇮🇳
कवयित्री ज्योती वर्णवाल
नवादा (बिहार)
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