साहित्य

शिशु के हौसले की दस्तक

ललन प्रसाद सिंह

घुटनों के बल
नापा है उसने
ब्रह्मांड अपना,
अदृश्य शक्ति के
उदात्त ताकत से

सात फीट की दूरी
उसके लिए
सात समंदर पार थी।

न कोई शब्द,
न कोई भाषा
बस एक जिद थी—
उस खिलौने को पाने की,

उसके भीतर हौसले का
एक बीज बोया
ईश्वर ने चुपके से

माँ-बाप तो बस
सीखने के बाद
ताली बजाते हैं,

पर वह नन्हा पंछी
बिना किसी नक्शे के
अपनी पहली उड़ान
भरता है ।
ईश्वर प्रदत्त हौसलों से

© ललन प्रसाद सिंह
वसंत कुंज, नई दिल्ली-70

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