साहित्य

ऊँची दुकान फीका पकवान: मुहावरे और विद्यार्थी

डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’ ‘विद्यासागर’

ऊँची दुकान फीका पकवान,
यानी बाहरी दिखावा अधिक हो
और गुणकर्म बहुत ही कम हो,
पर वास्तव में वस्तु में कुछ न हो।

दिखावा ज़्यादा पर गुण कम होना,
नाम के अनुसार वस्तु का ना होना,
या केवल दिखावटी वस्तु का होना,
अर्थात् आडम्बर ही आडम्बर का होना।

दुकान काफी बड़ी और मशहूर हो,
लेकिन उस दुकान का सामान बहुत
ही मामूली, बेकार और गुणवत्ता न हो
यही है “ऊँची दुकान फीका पकवान”।

बड़े बुजुर्ग हमें सिखा गए जरूरी नहीं,
जो बहुत मशहूर दुकान है वहीं पर
अच्छे सामान मिलेंगे क्योंकि बड़ी
दुकान में खराब सामान भी मिलते हैं।

“ऊँची दुकान फीका पकवान”
जैसे मुहावरे का अर्थ और उसके
वाक्य प्रयोग को समझ लीजिये,
परीक्षा में वाक्य प्रयोग कीजिए।

ऊंची दुकान फीके पकवान मुहावरे
का अर्थ दूसरी तरह से समझें तो
अक्सर लोग वहां ज्यादा जाते हैं
जहाँ की चमक दमक ज़्यादा हो।

लेकिन जरूरी होता है, जो दुकान
बहुत बड़ी या बहुत ही प्रसिद्ध हो,
वहाँ पर भी हर चीज को अच्छे से
देख परख कर ही लेना चाहिए।

परीक्षा में मुहावरों के प्रश्न पूछे जाते हैं,
एक शब्द के कई मुहावरे हो सकते हैं,
पर यह जरूरी नहीं कि परीक्षा में
यहाँ दिये गए मुहावरे ही पूछे जायँ।

प्रतियोगी परीक्षा की दृष्टिकोण से
भी मुहावरे बहुत महत्वपूर्ण होते हैं,
सभी प्रतियोगी परीक्षाओं में मुहावरे
का अपना-अपना महत्व होता है।

सभी भाषाओं में चाहे वह हिंदी में हो,
अंग्रेजी में हो यहां तक कि संस्कृत में
सभी भाषाओं मुहावरे पूछे जाते हैं,
अर्थात् परीक्षा में महत्वपूर्ण होते हैं।

ऐसे ही महत्वपूर्ण मुहावरे और हैं,
उनका वाक्य प्रयोग का अभ्यास,
अपने बनाये गए वाक्यों में करिये,
और परीक्षा की तैयारी भी करिए।

अपने पाँव पर आप कुल्हाड़ी मारना,
अक्ल पर पत्थर पड़ना, आड़े हाथ लेना,
आपे से बाहर होना, अक्ल घास चरने जाना, आसमान सिर पर उठाना आदि।

आदित्य मुहावरे कठिन नहीं होते हैं,
यदि उन्हें ध्यान से समझा जाए तो
याद करने की ज़रूरत नहीं होती है,
इन्हें समझ कर लिखा जा सकता है।

डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ

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