
सौ-सौ चूहे खा कर,
जब काली बिल्ली,
हज को चली,
तो रास्ते में उसके
गंगा पड़ी।
बिल्ली ने सोचा,
इतनी दूर क्यों जाऊं,
यहीं डुबकी लगाती हूंँ,
चूहे निगलने के
पाप धुलवाती है।
डुबकी लगाने ही वाली थी,
कि गंगा तन गई।
गुस्से में भर गई।
बोली,दूर रह मुझसे,
तेरे जैसों के पाप,
अब और न धोऊंँगी।
तू तो मुझे मैला कर
चली जाएगी,
मैं कैसे साफ़ होऊंँगी।
मेरा भी कुछ सोचा है,
या बस अपनी ही फ़िक्र है।
अपने अलावा किया
कभी किसी का जिक्र है?
बिल्ली खिसियाई
खंभा भी न नोच पाई
बगलें झांँकी,
लटका मुंँह
आगे खिसकी।
देखा उसने,
सामने खड़ी थी
भूरी बिल्ली।
विरोधी पार्टी की थी,
सोचा उड़ाएगी अब
ये मेरी खिल्ली।
कन्नी काट
आगे को निकली।
तभी भूरी बोली
कहां चली हमजोली?
हमजोली, मैं तुम्हारी।
ये कौन सी चाल है तुम्हारी?
हम दोनों में तो
छत्तीस का आँकड़ा है।
फिर यह कैसा लफड़ा है?
भूरी बोली
गुस्सा थूक दे बहना।
हम दोनों को
यहीं है मरना -जीना।
चूहों के सामने ही
संबंध हमारे खट्टे हैं,
वैसे तो हम दोनों,
एक ही थैली के चट्टे -बट्टे हैं।
इतनी आत्मीयता देख,
काली का मन भर आया।
कैसे दुत्कारा था गंगा ने,
सब दुखड़ा सुनाया।
बोली- अब तो सब
हमें पहचान गए हैं।
असलियत जान गए हैं।
अब चूहे कैसे पाएंगे
लगता है भूखे ही
मर जाएंगे।
भूरी घाघ थी पूरी
इस शतरंज की
माहिर खिलाड़ी थी।
अनगिन चूहे डकारे थे,
डकार तक न मारी थी।
बोली-लगता है
सत्ता के फील्ड में,
नई नई आई है,
ज़रा सी बात पर
बोल्ड होने से
तभी तो घबराई है।
एक गंगा के
पहचानने से
क्या होता है?
अभी तो जमुना बाकी है।
वहीं जाएंगे।
उसकी महिमा गाएंगे।
उसे झाड़ पर चढ़ाएंगे,
वहीं डुबकी लगाएंगे,
पाप धुलवाएंगे।
सत्ता सागर तल जाएंँगे।
यूंँ मैदान छोड़ना,
हमें नहीं सुहाता।
नकटे हैं हम,
हैं नकटों से नाता।
बिना नाक के भी
मज़े से जिएंगे।
बेशर्मी की मदिरा
जी भर पिएंगे।
बहुत से सरोवर,
नदी,नाले, तालाब,
अभी बाकी हैं।
जो हमें नहीं पहचानते,
हमारी साख हैं मानते।
उन्हीं के पास जाएंगे,
रोज फीस्ट पाएंगे।
तिलक छाप लगाएंगे,
चदरिया ओढ़ेगे,
राम-धुन गाएंगे।
बड़े बड़े तब
आगे पीछे डोलेंगे
हमारी जय -जय बोलेंगे।
परम ज्ञान पा ,
काली मुस्कराई, बोली
तुम तो
छुपी रुस्तम निकलीं
हमजोली।
डाल गलबहियांँ,
साथ उसके हो ली।
गंगा देख यह हैरान थी।
मन मार,रास्ता बदल,
आगे को बह ली।
डैमोक्रेटिक हो ली।
आज चुप हो जाना ही
समझदारी है।
इस चुप्पी में
चूहे, बिल्ली, गंगा
सब की साझेदारी है।
इसीलिए तो
तथाकथित डैमोक्रेसी
हमें बहुत बहुत प्यारी है।
हम इसके,यह हमारी है।
वीणा गुप्त
नई दिल्ली



